Wednesday, June 3, 2009

जंगल का राजकुमार तेंदुआ


यदि शेर जंगल का राजा है, तो जंगल के राजकुमार की पदवी निश्चय ही तेंदुए को मिलनी चाहिए। उसके जैसा साहसी, सुंदर और चतुर जानवर दूसरा नहीं है। तेंदुआ संपूर्ण अफ्रीका में और एशिया के दक्षिणी और पूर्वी भागों में पाया जाता है। भारत में वह कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक सभी जगह मिलता है। उसका सर्वाधिक पसंदीदा आवासस्थल घना वन है, पर वह कहीं भी रह सकता है, यहां तक कि रेगिस्तान में भी। उसे चाहिए बस तन छिपाने के लिए थोड़ी हरियाली और खाने के लिए कुछ अहेर प्राणी।

भारत में मिलनेवाला तेंदुआ सुंदर, छोटे बालोंवाला जानवर होता है। उसकी पीली-भूरी खाल पर फूल की पंखुड़ियों के समान दिखनेवाले असंख्य काले धब्बे होते हैं। विभिन्न परिवेशों में रहनेवाले तेंदुओं का रंग अलग-अलग हो जाता है। रेगिस्तानी तेंदुए रेत जैसे पीले होते हैं, जबकि कश्मीर के तेंदुए धूसर रंग के होते हैं।

कद में तेंदुआ बाघ अथवा सिंह से थोड़ा छोटा होता है। वयस्क नर 8 फुट लंबा होता है, जिसमें उसकी 3 फुट लंबी पूंछ भी शामिल है। मादा इससे कुछ छोटी होती है।

तेंदुआ जंगल और उसके आसपास के गांवों में मिलनेवाले लगभग हर प्राणी को मारकर खाता है, चाहे वह टिड्डे जैसा कीड़ा हो या एक बड़ा हिरण। बहुत बार वह अपने से कहीं बड़े जानवरों का भी शिकार करता है। बहुत छोटे अथवा बहुत बूढ़े तेंदुए छोटे जानवरों का शिकार करते हैं, जबकि पूर्णविकसित जवान तेंदुए बड़े जानवरों का। कभी-कभी तेंदुआ खतरनाक आदमखोर भी बन जाता है। अंग्रेजों के जमाने में जब हमारे जंगलों का बड़ी तेजी से सफाया हो रहा था और गोरे शिकारी बंदूकों से वन्यजीवों का संहार कर रहे थे, तब तेंदुए को आवास और भोजन दोनों की ही कमी महसूस हो रही थी। मजबूरन उसे मानव आवासस्थलों में आश्रय लेना पड़ा, जहां उसकी सीधी मुठभेड़ मनुष्यों से हुई। इस सदी के प्रारंभिक वर्षों में कुमाऊं क्षेत्र में आदमखोर तेंदुए विशेष रूप से समस्या बने। वहां रुद्रप्रयाग के एक आदमखोर तेंदुए ने 500 से ज्यादा मनुष्यों को मारकर खाया। ये सब बद्रीनाथ-केदारनाथ को निकले तीर्थयात्री थे।

तेंदुए की सफलता का राज शिकार करने की उसकी पद्धति में निहित है। चूंकि वह सिंह अथवा बाघ से छोटा है, वह अधिक सफलतापूर्वक लुक-छिपकर वार कर सकता है। इसी कारण कुछ वन्यजीव-विशेषज्ञ तेंदुए को बाघ और सिंह से भी बेहतर शिकारी मानते हैं, यद्यपि शिकार को मारने की उसकी शैली भी वही है, जो सिंह और बाघ की है, यानी घात लगाकर हमला करना। तेंदुआ हमेशा अकेले शिकार करता है। कभी-कभी तेंदुआ किसी पेड़ की शाखाओं पर लेट जाता है, और नीचे से गुजरते शिकार पर झपट पड़ता है। लंगूर तेंदुए के पसंदीदा आहार हैं। लंगूर भी तेंदुए को अपना सबसे बड़ा शत्रु मानते हैं। पेड़ों की ऊंचाइयां इस खूंखार जीव से उनकी रक्षा नहीं कर सकतीं क्योंकि तेंदुआ पेड़ चढ़ने में लंगूरों जितना ही कुशल होता है। कई बार पेड़ों पर फुदक रहे लंगूरों को दबोचने के लिए तेंदुए को पेड़ चढ़ना भी नहीं पड़ता। वह केवल पेड़ के नीचे आकर जोर-जोर से गुर्राने और अपनी पूंछ इधर-उधर झटकने लगता है। अपने अव्वल शत्रु को इतना पास और इतने गुस्से में देखकर लंगूरों की सांस फूलने लगती है और वे डालियों में इधर-उधर उत्तेजित होकर कूदने लगते हैं। घबराहट में उनमें से किसी का पाव फिसल जाता है, और वह सीधे तेंदुए के मुंह में आ गिरता है।

बहुत बार तेंदुआ अपने शिकार को पेड़ों पर खींच ले जाता है, ताकि उसे वह अन्य परभक्षियों और गिद्ध, गीदड़, लकड़बग्घा आदि मुर्दाखोर जानवरों से बचाकर शांति से खा सके। बचेखुचे मांस को भी वह पेड़ पर ही रहने देता है, ताकि बाद में भूख लगने पर वह उपलब्ध रहे। इसी आदत के कारण तेंदुआ भूखा न होने पर भी शिकार करता है।

तेंदुआ साल भर प्रजनन करता है। वन्य अवस्था में दो प्रसव के बीच कितना अंतराल होता है, यह ठीक-ठीक ज्ञात नहीं है, पर बंधनावस्था में एक मादा ने साढ़े तीन साल में तीन बार बच्चे जने। सामान्यतः एक बार में 2-3 शावक पैदा होते हैं।

जन्म के समय शावक अंधे होते हैं। तीन महीने के होने तक वे बहुत शोर करते रहते हैं। शिकार के लिए निकलते समय मादा बच्चों को मांद में छोड़ जाती है। जब शावक आठ महीने के हो जाते हैं, तब वे मां के साथ शिकार खेलने जाने लगते हैं। शावकों के पालन-पोषण में नर अधिक रुचि नहीं लेता। तेंदुओं की आयु कितनी होती है, यह पता नहीं है। चिड़ियाघर में एक मादा 12 साल जिंदा रही थी।

अपने सुंदर खाल के लिए तेंदुओं की निर्मम हत्या होती है। किसान भी उसे अपने मवेशियों के लिए खतरा मानकर जहर देकर मार डालते हैं। फिर भी वन्य अवस्था में तेंदुए का भविष्य उज्ज्वल ही कहा जाएगा। तेंदुआ हर विषम परिस्थिति के लिए अपने आपको ढाल लेता है। बदलते मौसम, मिटते आवासस्थल और आहार बननेवाले प्राणियों की घटती संख्या का उस पर कोई विपरीत असर देखा नहीं गया है। प्रजनन की ऊंची दर, हर प्रकार के जीवों को खाने की क्षमता तथा विभिन्न परिवेशों में रह सकने की शक्ति ने इस दरिंदे में गजब की जिजीविषा भर दी है।

2 comments:

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

जानकारियों से भरी पोस्ट।
बधाई।

alka sarwat said...

प्रिय बन्धु
जय हिंद
साहित्य हिन्दुस्तानी पर पधारने के लिए धन्यवाद
हम भी तेंदुए जैसी जिजीविषा के मालिक बनना चाहते हैं
अगर आप अपने अन्नदाता किसानों और धरती माँ का कर्ज उतारना चाहते हैं तो कृपया मेरासमस्त पर पधारिये और जानकारियों का खुद भी लाभ उठाएं तथा किसानों एवं रोगियों को भी लाभान्वित करें

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