Thursday, June 4, 2009

मांसभक्षी पौधे

मांस भक्षी पौधों की खोज सर्वप्रथम 1875 में हुई। चार्ल्स डारविन ने इन पौधों के बारे में लिखा है, ''कुछ पौधे न केवल छोटे जीवों को पकड़ने की क्षमता विकसित कर गए हैं, बल्कि उन्हें पचाकर उनमें मौजूद पोषक तत्वों को अवशोषित करने की क्षमता भी''। यह बात उन्होंने सौ साल से ज्यादा समय पहले कही थी, परंतु आज भी हमें मांसभक्षी पौधों को देखकर अचंभा हुए बिना नहीं रहता।

पौधे सामान्यतः प्रकाश संश्लेषण विधि से अपना भोजन खुद बना लेते हैं। फिर ऐसा क्यों कि कुछ पौधे मांसभक्षी हो गए हैं? ये सब पौधे ऐसी मिट्टी में उगते हैं जिसकी प्रकृति अम्लीय अथवा दलदली होती है। इस तरह की मिट्टी में नाइट्रोजन की मात्रा बहुत कम होती है और इस कमी को पूरा करने के लिए ये पौधे कीटों को पकड़कर उनके शरीर से नाइट्रोजन प्राप्त करते हैं।

मांसभक्षी पौधों ने अपने शिकार को फुसलाने और पकड़ने के अनेक तरीके विकसित किए हैं। एक ही प्रकार के पौधों में भी कीटों को पकड़ने की विधि में अंतर पाया जाता है। विस्मय की बात यह है कि कीटों को पकड़ने और पचानेवाले ये वीभत्स अवयव सौंदर्य से परिपूर्ण होते हैं।

ये पौधे मुख्यतः छोटे कीटों को पकड़ते हैं, जैसे तितलियां, चिउरे और ततैए। कभी-कभी ये मेंढ़क जैसे छोटे जीवों को भी फंसा लेते हैं। एक तरह का मांसभक्षी पौधा जो पानी में रहता है, छोटे जलजीवों को पकड़ता है।

जीवों को पकड़नेवाले अवयव दो तरह के होते हैं--निष्क्रिय और सक्रिय। निष्क्रिय अवयवों में किसी प्रकार की गति नहीं होती और वे शिकारों को विभिन्न तरकीबों से अपनी ओर आकर्षित करते हैं। इसके विपरीत सक्रिय अवयव शिकार की ओर बढ़कर या अन्य किसी प्रकार से गति करके शिकार को फंसाते हैं।


सन-ड्यू एक सामान्य मांसभक्षी पौधा है, जो देश के अनेक भागों में पाया जात है। इसके पत्तों पर अनेक रेशे निकले रहते हैं जो एक चिपचिपा रस पैदा करते हैं जो सूरज की रोशनी में ओस के कणों के समान चमकते हैं। ये रेशे पत्ते की सतह पर से ऊपर की ओर तने हुए रहते हैं, मानो पिनकुशिन पर पिन खुंसे हुए हों। ये रेशे दो प्रकार के होते हैं--किनारों पर लगे हुए लंबे रेशे और अंदरूनी छोटे रेशे।

चमकते बूंदों से आकर्षित होकर आए कीट इन बूंदों के साथ चिपक जाते हैं। कीटों के छटपटाने से लंबे रेशे सक्रिय हो जाते हैं और वे चारों तरफ से कीट की ओर झुक आते हैं, जिससे कीट बंदी बन जाता है। इन रेशों से एक प्रकार का पाचक द्रव भी रिस आता है, जो कीट के शरीर को गला देता है। इस द्रव को ये रेशे अवशोषित कर लेते हैं। पाचन क्रिया पूर्ण होने पर रेशे पुनः तन जाते हैं और अगले शिकार की प्रतीक्षा करने लगते हैं।


घटपर्णी असम के खासी पहाड़ियों में पाई जाती है। इसमें पत्ते एक लंबी नली के रूप में विकसित हुआ होता है जिसके मुंह पर एक ढक्कन होता है। नली के पेंदे पर एक मीठा तरल रहता है जो कीटों को आकर्षित करता है। इसे खाने के लालच में जो कीट नली के भीतर उतरते हैं, उनके लिए वह मौत का कुंआ बन जाता है क्योंकि नली में पानी और पाचक द्रव रहता है, जिसमें वह अभागा कीट डूबकर मर जाता है। बाद में उसका शरीर उसी में गल जाता है और पत्ता उस तरल को सोख लेता है। नली का रंग भी आकर्षक और लुभावना होता है।

हिमालय में एक अन्य मांसभक्षी पौधा मिलता है जिसे बोटलरवर्ट कहते हैं। इसके चौड़े पत्तों पर चिपचिपा तरल रिसाने वाले अवयव रहते हैं। इस पर छोटे कीट चिपक जाते हैं। बारिश का पानी इन्हें पत्ते के किनारे की ओर बहा ले जाता है और पत्ता अंदर की ओर मुड़कर कीट को अपनी लपेट में ले लेता है। पत्ते से अब पाचक द्रव रिस आते हैं जो कीट को गला देते हैं और पत्ते उस तरल को सोख लेता है। बाद में पत्ता पुनः खुल जाता है।



अमरीका के करोलिना क्षेत्र में एक अन्य मांसक्भक्ष्षी पौधा उगता है, जिसे वीनस फ्लाई ट्रेप कहते है। इसके पत्ते दो भागों में बंटे होते हैं और दोनों के बीच जो रीढ़नुमा उभार होता है, वह दरवाजे के कब्जे के रूप में कार्य करता है। दोनों भागों के किनारों पर लंबे कांटे होते हैं। पत्ते के दोनों भागों की सतह पर संवेदनशील बाल जैसे तीन लंबे रेशे भी तने होते हैं। इनमें से किसी को कोई कीट छू दे तो पत्ते के दोनों भाग सटाक से बंद हो जाते हैं और कीट को अपने भीतर कैद कर लेते हैं। दोनों किनारों के कांटे आपस में फंस कर कीट को अच्छी तरह जकड़ लेते हैं। पत्ता कीटों द्वारा की गई हलचल और अन्य कारणों से हुई हलचल (जैसे हवा के चलने से हुई हलचल) में अंतर कर सकता है। कीटों को फंसाने पर पत्ता उसके पूरा पच जाने के बाद ही खुलता है, परंतु अन्य कारण से बंद होने पर वह तुरंत फिर खुल जाता है। पत्ता इन दोनों प्रकार की हलचलों में अंतर कैसे कर पाता है, यह प्रकृति का एक रोचक रहस्य है।

ब्लैडरवर्ट नाम मांसाहारी पौधा भारत के अधिकांश जलाशयों में मिलता है। पूरा पौधा पानी के नीचे रहता है और उसके पत्ते बहुत अधिक खंडित होते हैं। जीवों को पकड़नेवाला कटोरानुमा अवयव पत्तों के सिरे पर रहता है। इसके खुलने और बंद होने की क्रिया एक वाल्व द्वारा संचालित होती है। पानी के बहाव के साथ कोई जीव कटोरे में घुस जाए तो उसका मुंह बंद हो जाता है। वाल्व कटोरे को पुनः तभी खोलता है जब जीव पूरा पच गया हो।

मांसाहारी पौधे जीवों की अद्भुत जिजीविषा का ही परिचय देते हैं। चाहे जैसी विषम परिस्थिति हो, जीव जीवित रहने का सरल-कठिन, उल्टा-सीधा मार्ग ढूंढ़ ही निकाल लेते हैं।

(चित्र शीर्षक, जिस क्रम में वे लेख में आए हैं:-
1. सन ड्यू
2. घटपर्णी
3. वीनस फ्लाई-ट्रैप

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यू ट्यूब पर मांस भक्षी पौधों के वीडियो:-
1. घटपर्णी
2. वीनस फ्लाई-ट्रैप

5 comments:

Vivek Rastogi said...

बहुत अच्छी जानकारी, काफ़ी दिनों बाद मांसभक्षी पौधों के बारे में पढ़ा।

Science Bloggers Association said...

आपके इस प्रयास की जितनी तारीफ की जाए कम है।
-Zakir Ali ‘Rajnish’
{ Secretary-TSALIIM & SBAI }

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...

अच्छी जानकारी है।

विजय वडनेरे said...

क्या ऐसे पौधों का कोई वीडियो भी है क्या आपके पास??
मुझे इन्हें अपना खाना खाते हुये देखने में बड़ी दिलचस्पी रहेगी।

बालसुब्रमण्यम said...

विजय वडनेरे जी: यू ट्यूब पर मांस भक्षी पौधों के कुछ अच्छे वीडियो हैं। इनमें से दो की कड़ियां लेख के नीचे दे दिए हैं।

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