Monday, June 8, 2009

डायनोसर के वंशज सरीसृप

छिपकली, सांप आदि रेंगनेवाले जीवों को सरीसृप कहा जाता है। सरीसृप एक ऐसा जीव है जिसका शरीर बालों के बजाए शल्कों से ढका रहता है। वह खोलवाले अंडे देता है। अपने शरीर को गरम रखने के लिए वह बाहरी वातावरण के तापमान पर निर्भर करता है। संसार में लगभग ६,००० सरीसृप हैं। उनके चार मुख्य विभाग हैं - कछुए, छिपकली, सांप और मगर।

हरा कच्छप

कच्छुए अनेक आकारों और वजनों के पाए जाते हैं। सबसे छोटी जाति के कछुए का वजन कुछ ग्राम ही होता है, जबकि गालापागोस द्वीप समूह का विशाल कछुआ ४५० किलो भारी होता है, यानी एक भैंस जितना। प्रागैतिहासिक काल के कछुए इससे भी बड़े होते थे। लोग समझते हैं कि कछुए सदा जीवित रहते हैं, किंतु उनकी अधिकतम आयु सौ वर्ष से अधिक नहीं होती। कछुओं की अनेक जातियां जमीन पर रहती हैं, जबकि बहुत से कछुए समुद्रों और नदी-तालाबों में रहते हैं।
कछुए का सबसे प्रसिद्ध अवयव उसकी ढाल है। पच्चीस करोड़ वर्ष पूर्व यूनोटोसोरस नामक एक जीव रहता था जिसकी पसलियां काफी चौड़ी और आपस में जुड़ी थीं। शायद यही कछुए का पूर्वज था। खतरा लगने पर कछुआ अपना सिर और हाथ-पैर ढाल के अंतर खींच लेता है। सभी कछुओं की ढाल सख्त नहीं होती है। बहुत से कछुओं की ढाल चमड़े जैसी मुलायम भी होती है। ढाल के कारण कछुए को काफी परेशानी उठानी पड़ती है। अपने घर को अपनी पीठ पर ही लादे हुए होने के कारण कछुआ बहुत धीमे ही चल सकता है। ढाल के कारण कछुए को सांस लेने में भी तकलीफ होती है। ढाल के भीतर उसका वक्ष फूल नहीं सकता। सांस लेने के लिए कछुआ एक विशेष जोड़ी मासपेशी का उपयोग करता है, जिसके सिकुड़ने और फैलने से हवा फेंफड़ों में आती-जाती है।

बहुरूपिया (केमीलियन)

छिपकलियां अनेक आकार-प्रकार की होती हैं। लंबाई में वे ५ सेंटीमीटर से लेकर ३०० सेंटीमीटर तक की होती हैं। वे देखने में डरावने रूपवाले हो सकते हैं या कीड़े जैसे निरीह। छिपकलियों में सर्वाधिक परिचित घरेलू छिपकली है। उसकी सबसे बड़ी विशेषता उसकी आवाज है। सरीसृपों में यह बहुत ही दुर्लभ विशेषता है क्योंकि बहुत कम सरीसृप आवाज निकाल सकते हैं। भूखे शत्रु द्वारा पकड़े जाने पर घरेलू छिपकली अक्सर अपनी पूंछ शरीर से अलग कर देती है। शरीर से अलग हुई पूंछ जीवित प्राणी के समान छटपटाती है और शत्रु का ध्यान अपनी ओर आकर्षित करती है। इसका फायदा उठाकर छिपकली सुरक्षित स्थान की ओर भाग जाती है। कुछ ही दिनों में उसकी नई पूंछ आ जाती है।

छिपकलियों के संसार के दैत्य गोह हैं। पूर्वी इंडीज में एक गोह पाई जाती है जिसे उचित ही कोमोडो ड्रेगन कहते हैं। उसकी लंबाई ३ मीटर है। गोह खूंखार परभक्षी होते हैं और अपने शिकार को लंबी दूरी तक पीछा करके पकड़ते हैं। उनकी गर्दन लंबी और लचीली होती है और वे जीभ को सांपों की तरह मुंह से काफी बाहर निकाल सकते हैं। गोहों के बारे में प्रसिद्ध है कि पुराने जमाने में सैनिक उनकी सहायता से किलों की दीवारों पर चढ़ते थे।

नागराज

सांपों का विकास छिपकलियों से ही हुआ है, यद्यपि दोनों में काफी अंतर हैं। सबसे पहला अंतर यह है कि छिपकली चार पैरों की सहायता से चलती हैं, जबकि सांप में पैर नदारद होते हैं और वह जमीन पर केवल रेंग सकता है। सांपों और छिपकलियों में कुछ अन्य अंतर भी हैं, जैसे छिपकलियों की आंखों में पलकें होती हैं, जबकि सांपों की आंखें पलकहीन होती हैं और सदा खुली रहती हैं। छिपकलियों में सुनने के अवयव होते हैं, जबकि सांपों में वे नहीं होते।

सांपों के जो चार परिवार सर्वाधिक परिचित हैं, वे हैं भींचनेवाले सांप, मंडली सांप, नाग और विषहीन सांप। इनमें से प्रथम सबसे प्राचीन है और उसमें हैं अजगर, अनाकोंडा, बोवा आदि विशाल सांप। ये विषहीन सांप अपने शिकार को कुंडलियों में भींचकर मारते हैं। अनाकोंडा विश्व का सबसे बड़ा सांप है। ११ मीटर लंबे अनाकोंडा पाए गए हैं। अजगर १० मीटर लंबे हो जाते हैं। इस परिवार में कुछ छोटे सांप भी हैं, जैसे दुमुहा सांप।

विषवाले सांपों को दो वर्गों में बांटा गया है--मंडली सांप (वाइपर) और नाग। नाग फनधारी सांप होते हैं। वे शिकार को विषदंतों से मारते हैं। मंडली सांपों की तुलना में नाग छरहरे बदन वाले सांप होते हैं। मंडली सांपों में विषदंत नागों के विषदंतों से बहुत बड़े होते हैं। इन विषदंतों को सांप आवश्यकता न होने पर अपने मुंह के अंदर मोड़कर रख सकता है। कुछ विषैले सांपों में विषदंत जबड़े के आगे न होकर पिछले हिस्सों में होते हैं। साधारणतः इस प्रकार के सांप कम जहरीले होते हैं। भारत में सामान्यतः पाए जानेवाले विषैले सांपों में से केवल चार मनुष्य को मार सकते हैं। ये हैं नाग, करैत, फुरसा और दबोइया। इनके काटे का एकमात्र इलाज जहर-रोधक सीरम है जिसे ऐंटीवेनम कहा जाता है।

विश्वभर में सबसे बड़ा विषैला सांप नागराज है। उसकी लंबाई ५.५ मीटर होती है। उसके मुंह में इतना विष होता है कि वह एक हाथी तक को मार सकता है। पर वह अत्यंत दुर्लभ सांप है और अंदमान आदि द्वीपों के घने वनों में ही पाया जाता है।

घड़ियाल

सरीसृप वर्ग के दानव मगर हैं। वे पानी और जमीन में एक-जैसी सहूलियत से रह सकते हैं। अपने विशाल आकार और डरावनी बनावट से मगर डायनोसरों की याद दिलाते हैं। भारत में मगरमच्छ और घड़ियाल इस वर्ग के सबसे बड़े प्राणी हैं। घड़ियाल मत्स्यभोजी है। मगरमच्छ मछलियों के अलावा हिरण, सूअर आदि बड़े प्राणियों को भी खाता है। कुछ तो मानवभक्षण की आदत भी डाल लेते हैं।

एक समय पृथ्वी पर सरीसृपों का एकछत्र राज था। तब हाथियों से भी बड़े डायनोसर धरातल पर विचरा करते थे। आजकल के कछुए, छिपकली, सांप और मगर इन्हीं डायनोसरों से विकसित हुए हैं। डायनोसर आज नहीं रहे। कुछ अज्ञात कारणों से कुछ करोड़ वर्ष पहले वे सब विलुप्त हो गए।

2 comments:

Arvind Mishra said...

अच्छी जानकारी ! फोटो घड़ियाल का है ! अजगर की पसली में पैरों के अवशेष दिखते हैं !

गिरिजेश राव said...

घड़ियाली आँसुओं का राज क्या है?
क्या डायनासोर रोने में सक्षम थे?

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