Tuesday, June 16, 2009

कंगारू को कराटे आता है?



कंगारू आस्ट्रेलिया में पाया जानेवाला एक विचित्र स्तनधारी जीव है। विचित्र इसलिए क्योंकि वह अन्य सभी स्तनधारियों से पर्याप्त भिन्न है।

प्राणीविदों ने कंगारू को मारस्यूपिएल अर्थात थैलीदार जीव के वर्ग में रखा है। इस वर्ग में 63 थैलीदार जीव हैं। इन सबमें मादा के पेट पर एक थैला रहता है, जिसमें नवजात शिशु कुछ समय के लिए रहते हुए विकसित होता है। कंगारू के शिशु को जोई कहते हैं।

लाल कंगारू इस वर्ग का सबसे बड़ा सदस्य है। एक पूर्ण विकसित नर दो मीटर ऊंचा हो सकता है और उसका वजन 90 किलो के आसपास होता है।

कंगारू स्तनधारी तो हैं, लेकिन वे पूर्ण विकसित बच्चों को जन्म नहीं देते। कंगारू अत्यंत शुष्क प्रदेशों में रहते हैं जहां बारबार सूखा पड़ता है। इसलिए इन प्राणियों ने सूखे से बचने के लिए प्रजनन की एक अनोखी विधि विकसित कर ली है। इनके बच्चों का विकास दो चरणों में होता है। मादा की कोख में थोड़ा विकास, और बाकी का विकास मादा के पेट पर बनी थैली में।

कंगारुओं में गर्भाधान काल बहुत ही छोटा होता है, यही 30 -35 दिन। इतनी कम अवधि में कंगारू शिशु, यानी जोई, का विकास भी अपूर्ण ही होता है। वह पैदा होती ही अपनी मां के पेट की थैली में चला जाता है और लगभग नौ महीने तक इसी थैली में रहता है और विकसित होता जाता है। नौ महीने के बाद वह थोड़े-थोड़े समय के लिए बाहर निकलने लगता है।

(मां के स्तनों से चिपका हुआ जोई।)

इन जानवरों का नाम कंगारू कैसे पड़ा, इसको लेकर भी एक रोचक कहानी है। कप्तान जेम्स कुक और प्रकृतिविद जोसेफ बैंक्स आस्ट्रेलिया के जंगलों में घूम रहे थे। उन्होंने पास चर रहे कंगारुओं की ओर इशारा करके स्थानीय निवासियों से पूछा कि इन्हें आप लोग क्या कहते हैं? स्थानीय लोगों को कुक और बैंक्स की बात समझ में नहीं आई। उन्होंने अपनी भाषा में कहा, कंगारू, जिसका मतलब था, हम आपकी बात समझ नहीं पाए। कुक और बैंक्स को लगा कि ये इन जानवरों का नाम ही बता रहे हैं, और इनकी भाषा में इन जानवरों को कंगारू कहा जाता है। यही नाम उन्होंने अपने जर्नलों में नोट कर लिया और अन्य यूरोपियों को भी बता दिया। इस तरह इन जानवरों का नाम कंगारू पड़ गया।

थैलीदार जीवों के विकास की कहानी काफी रोचक है। उसका घनिष्ट संबंध पृथ्वी के भूखंडों के विकास से भी है। भूवैज्ञानिक मानते हैं कि करोड़ों वर्ष पहले पृथ्वी के सभी भूखंड परस्पर जुड़े हुए थे और पैंजिया नामक एक विशाल भूखंड के रूप में विद्यमान थे। जब स्तनधारियों का उद्भव हुआ, लगभग उस समय यह भूखंड धीरे-धीरे टूटकर बिखरता गया और आजकल के अलग-अलग महाद्वीपों का रूप लेता गया। आस्ट्रेलिया का भूखंड अन्य सभी भूखंडों से बहुत दूर चला गया और उस पर मौजूद आदिम स्तनधारी अन्य महाद्वीपों के स्तनधारियों से अलग-थलग पड़ गए। वहां उनका विकास अलग तरीके से होने लगा और अंत में उन्होंने थैलीदार स्तनधारियों का रूप ले लिया।

कंगारू आस्ट्रेलिया के वनों में तृण भक्षियों की भूमिका निभाते थे, यानी वही भूमिका जो भारतीय जंगलों में गौर, हिरण, मृग आदि और अमरीका के जंगलों में बाइसन, और अफ्रीकी जंगलों में गैंडा, जिराफ, जेबरा, मृग आदि निभाते हैं।

जब कंगारू को यूरोपियों ने पहले पहल देखा, तो उन्हें वह काफी विचित्र लगा था। एक यूरोपीय ने उसका वर्णन इस प्रकार किया – इनका सिर हिरणों के जैसा होता है, पर शृंगाभ नहीं होते, ये मनुष्य की तरह दो टांगों पर खड़े हो जाते हैं, और इनकी चाल मेंढ़क की चाल जैसी होती है।

कंगारुओं में लंबी, मजबूत पिछली टांगें होती हैं, और उनका पिछला पैर खूब बड़ा और विकसित होता है। इस बलिष्ठ अवयव की मदद से वे कूद कूदकर आगे बढ़ते हैं। इनकी आगे की टांगें छोटी होती हैं। पूंछ खूब लंबी और मांसल होती है। इसकी सहायता से वे कूद-कूदकर जाते समय अपना संतुलन बनाए रखते हैं। पूंछ को वे पांचवें पैर के रूप में भी इस्तेमाल करते हैं। उनका सिर छोटा होता है।

सभी स्तनधारियों में कंगारू ही आने-जाने के लिए पिछली टांगों पर कूदने की विधि अपनाते हैं। साधारणतः कंगारू 20-30 किमी प्रति घंटे की रफ्तार से बढ़ सकते हैं, पर जरूरत पढ़ने पर वे 70 किमी प्रति घंटे की रफ्तार भी पकड़ सकते हैं। एक ही छलांग में वे 30 फुट की दूरी तय कर सकते हैं।

दोनों टांगों की असंतुलित लंबाई के कारण कंगारू अन्य स्तनधारियों के समान जमीन पर चल नहीं सकते। जब धीमी गति से आगे बढ़ना हो, तो कंगारू अपनी मजबूत पूंछ और दोनों पिछली टांगों का एक साथ प्रयोग करता है। पूंछ को जमीन पर दबाकर वह अपने शरीर को थोड़ा ऊपर उठाता है और अपनी पिछली टांगों को आगे बढ़ाकर अपने शरीर को आगे ले आता है।

वन्य अवस्था में कंगारू की आयु 6 से 8 वर्ष होती है।

यद्यपि कंगारू भी गाय-भैंसों की तरह घास और अन्य वनस्पतियों को ही चरते हैं, उनकी पाचन व्यवस्था कुछ भिन्न होती है। गाय-भैंसों के पेट में कई प्रकार के जीवाणु रहते हैं, जो पाचन में मदद करते हैं, और इस प्रक्रिया में खूब सारी मीथेने और अन्य गैसों का उत्सर्जन भी करते हैं। पर कंगारू के पेट में जो जीवाणु होते हैं, वे वानस्पतिक सामग्री के किण्वन से पैदा हुई सामग्री को एसीटेट में बदल देते हैं, जिससे और भी अधिक ऊर्जा मिलती है, और मीथेन गैस भी नहीं बनती है।

कंगारुओं के पेट में जो जीवाणु इस काम को अंजाम देते हैं, उन्हें गाय-भैंसों में स्थापित करने की ओर वैज्ञानिक प्रयासरत हैं। इससे गाय भैंसों की पाचन क्रिया अधिक कार्यक्षम बन सकती है और मीथेन जैसी जलवायु परिवर्तन लानेवाली गैसों का उत्सर्जन भी कम हो सकेगा।

कंगारुओं के अब बहुत कम कुदरती परभक्षी बचे रह गए हैं। जो थे उन सबको आस्ट्रेलिया में पहुंचे मनुष्यों ने खत्म कर दिया है। अब कंगारुओं को मनुष्यों से ही सबसे अधिक खतरा है। मनुष्य उन्हें मांस के लिए खूब मारते हैं।


और अंत में वह सवाल जिसके उत्तर का आपको इंतजार था – क्या कंगारू को कराटे आता है? दरअसल हर नर कंगारू का एक क्षेत्र होता है, जिसकी वह अन्य नर कंगारुओं से रक्षा करता है। जब उसके क्षेत्र में किसी अन्य नर का अतिक्रमण होता है, तो नर उसे चुनौती देता है, और दोनों के बीच युद्ध छिड़ जाता है। पूंछ को पांचवे पैर के रूप में इस्तेमाल करके वे उसके सहारे जमीन पर खड़े हो जाते हैं और एक दूसरे पर अपने पैरों से आघात करते हैं, उसी तरह जैसे कुश्ती, मुक्केबाजी या कराटे में संलग्न मानव प्रतिद्वंद्वी करते हैं। कंगारुओं की पिछली टांगें खूब मजबूत होती हैं, और बीच की उंगली का नाखून भी खूब लंबा और तीक्ष्ण होता है। इससे प्रतिद्वंद्वी का पेट चिर सकता है। इससे बचाव के लिए उसके पेट की चमड़ी अधिक मोटी और सख्त होती है।


कंगारुओं की इस झगड़ालू आदत के कारण ही यह धारणा चल पड़ी है कि वे कराटे-बोक्सिंग में उस्ताद होते हैं। कार्टून फिल्मों और किस्सों में भी इस बात को खूब उभाड़ा गया है। आस्ट्रेलिया में चिड़ियाघरों में कंगारुओं को दस्ताने पहनाकर उनके और मनुष्य मुक्केबाजों के बीच प्रतियोगिता कराई जाती है।

इसलिए आप एक तरह से कह सकते हैं कि कंगारू को कराटे आता है।

3 comments:

gargi gupta said...

बहुत अच्छे

Udan Tashtari said...

कंगारु पर इतना रिसर्च और सूक्ष्म जानकारी. गजब भाई गजब!!

बहुत बहुत आभार इतनी सारी जानकारी के लिए और इस रोचक प्रस्तुतिकरण के लिए.

अल्पना वर्मा said...

bahut hi rochak jaankari..dhnywaad

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