Thursday, June 25, 2009

भूत-प्रेतों का डेरा पीपल का वृक्ष


पीपल के पेड़ पर भूत-पिशाच रहते हैं, यह अंधविश्वस हमारे भारतीय समाज में बहुत अधिक जड़ें जमाया हुआ है। परंतु यह कम ही लोगों को पता होगा कि विश्व भर के वृक्षों में यह सबसे अधिक मात्रा में आक्सीजन उत्पन्न करता है।

वैज्ञानिकों का कहना है कि प्रकृति की यह अनुपम देन प्रति घंटे 1,700 किलोग्राम आक्सीजन उत्सर्जित करता है। यानी पर्यावरण शुद्धि में पीपल का अत्यधिक महत्व है। इसके अलावा यह वृक्ष अपनी घनी छाया और सुंदरता के लिए भी विख्यात है।

पीपल के बारे में धार्मिक मान्यता है कि इसकी जड़ों में ब्रह्मा, तने में विष्णु और पत्तों में महेश का वास होता है। इसीलिए अनेक पूजा विधियों एवं धार्मिक अनुष्ठानों में पीपल के नीचे दीपक जलाने और उसकी पूजा करने का चलन है। धार्मिक आस्था से जुड़े होने के कारण ही इस वृक्ष को आमतौर पर काटा नहीं जाता है।



पीपल का वानस्पतिक नाम फाइकस रिलिजियोसा है। यह वृक्ष मंदिरों के आसपास अथवा सड़कों के किनारे अधिक मिलता है। यह भी है कि जहां पीपल का वृक्ष होता है, वहीं लोग पूजा-आरती शुरू करके उस स्थान को मंदिर में बदल देते हैं। हिंदू और बौद्ध धर्मों में पीपल का अत्यधिक महत्व है। धार्मिकता का केंद्र होने के कारण ही इस वृक्ष का वानस्पतिक नाम रिलिजियोसा है।

शुष्क जलवायु में कुछ समय के लिए उसके पत्ते झड़ जाते हैं, अन्यथा पूरे वर्ष वह हरा-भरा रहता है। जनवरी से मार्च के बीच उस पर नई पत्तियां आ जाती हैं। ये शुरू में तांबे के रंग की होती हैं, बाद में हरा रंग प्राप्त करती हैं। इन पत्तों का आकार हृदय जैसा होता है। उनका सिरा लंबा और नुकीला होता है। इस कारण से बारिश में पत्तों पर लग गया पानी पत्ते के सिरे के जरिए जल्दी ही उतर जाता है। इन पत्तों का डंठल हल्का व चपटा होता है और टहनी से वह लचीले रूप से जुड़ा रहता है। इस कारण से पत्ते सदैव हिलते रहते हैं और हल्की सी हवा में भी पीपल के पेड़ से सरसराहट की तेज ध्वनि आती है। इन पत्तों की सतह खूब चमकीली होती है और चंद्रमा के प्रकाश में तीव्रता से झिलमिलाती हैं। सरसराहट और चमकीले पत्तों के कारण रात को इस विशाल वृक्ष का रूप सचमुच डरावना हो जाता है। शायद इसीलिए लोग मानने लगे कि इस वृक्ष में भूत-पिशाच का वास होता है।

पीपल के फूल आमतौर पर बाहर से दिखाई नहीं देते हैं। फल अप्रैल-मई में लगते हैं। वे गुच्छों के रूप में तने से चिपके रहते हैं। पकने पर उनका रंग गहरा बैंगनी हो जाता है। पशु-पक्षी इन्हें बड़े चाव से खाते हैं।

पीपल दीर्घायु वाला वृक्ष है। श्रीलंका में एक पीपल दो हजार वर्षों से भी पुराना बताया जाता है। उसे भारत से ही वहां ले जाया गया था। पीपल में सूखी जलवायु झेलने की अद्भुत क्षमता होती है।

पीपल की एक विशेषता और है। वह यह कि पीपल जमीन में कठिनाई से उग पाता है। लेकिन पुराने मकानों, दीवारों अथवा दूसरे वृक्षों पर वह आसानी से जड़ें उतार लेता है। इन जगहों पर उसके बीज पक्षियों के जरिए पहुंचते हैं। जब पीपल किसी और वृक्ष पर उगने लगता है, तो वह धीरे-धीरे उस वृक्ष का दम घोंट देता है और उसका स्थान ले लेता है। जंगलों में इसके बहुत से उदाहरण देखने को मिलते हैं। यदि मकानों पर उग आए पीपल को रहने दिया जाए, तो उसकी जड़ें मकान भर में फैल जाएंगी और अंततः मकान खंडहर में बदल जाएगा।

पीपल जिस वनस्पति-समूह में है, उसी में एक और विशाल और परिचित वृक्ष है, बरगद, पर उसके बारे में किसी अन्य लेख में।

13 comments:

RAJ SINH said...

सुन्दर जानकारी . अब बरगद का इन्तेज़ार .

Udan Tashtari said...

क्या क्या कहानी निकाल रहे हो!

गिरिजेश राव said...

एक 'ज़ेन कथा'(हम अब कथ्थक होते जा रहे हैं) ;)

एक जादूगर था जो अपनी टोप से भाँति भाँति की चीजें निकालता था। एक दिन जादूगर ने टोप से खुद को निकाला।
उसके बाद वह फिर नहीं दिखा।

अब टोप से निकला जादूगर टोप पहन कर कहानियाँ सुनाया करता है।

नागर्जुन रचित् 'बाबा बटेसरनाथ' की एक समीक्षा लिखिए।

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...

पीपल का भूत खूब सुना है। यह भी कि उस में विष्णु का निवास है। हमारी तो आज तक यह समझ नहीं आया कि विष्णु भूत हैं या भूत विष्णु है, या दोनों में मित्रता है।

'अदा' said...

बहुत ही अच्छी जानकारी दी आपने बहुत बहुत धन्यवाद,
आपके लेख को पढ़ कर एक ख्याल आया,
आपने बताया की पीपल का वृक्ष सबसे ज्यादा आक्सीजन देता है - तो क्या यह संभव है कि गौतम बुद्ध जो बोधि-वृक्ष (पीपल के वृक्ष) के नीचे ही बैठे थे और उन्हें ज्ञान के प्राप्ति हुई, कहीं यह उसी आक्सीजन का कमाल तो नहीं था ,
इस पर भी विचार किया जा सकता है
मैं फिर कल आऊँगी....

परमजीत बाली said...

सुन्दर जानकारी

रंजना [रंजू भाटिया] said...

बहुत अच्छी जानकारी दी है आपने वाकई इसके पत्ते बहुत आकर्षित करते हैं अपनी तरफ ..

Manisha said...

पूर्वजों ने पीपल के अदभुत गुणों को जानकर ही भूत-प्रेतों की कहानियां फैलाईं थी ताकि आम आदमी इस काम के पेड़ को यूं ही न काटा करें और पर्यावरण के लिये पीपल काम करता रहे।

मनीषा
www.hindibaat.com

Raj said...

Very Intresting ....vaise hamare yaha manyata hai ki peepal me BrahmDev ka vas hota hai....

Peepal ka aurvadic mahatva bhi bahut adhik hai.......

प्रकाश गोविन्द said...

आपके ब्लॉग पर पहली बार आना हुआ ! अच्छा लगा !

पीपल के पेड़ के बारे में महत्वपूर्ण व ज्ञानवर्धक जानकारी देने के लिए आभार !

हमारे पूर्वज पीपल का पर्यावर्णीय महत्व समझ गए थे इसीलिये उन्होने आम जन-मानस को पीपल को नष्ट करने से रोकने के लिए ऐसी कथाओं का सहारा लिया !

शुभकामनाएं

आज की आवाज

राज भाटिय़ा said...

मै प्रकाश गोविन्द जी की बात से सहमत हुं, हमारे पुर्वजो को पेडो का, नदियो का महत्व पता था, इस लिये इसे नालायक ओलाद नष्ट ना करे उन्होने इन सब के बारे यह कहानियां गढी, लेकिन हम उन कहानियो को अलग रुप मे देख कर अंध विशवास, ओर उस का उलटा करने लगे, जिस का परिणाम आज सब देख रहे है, हद से ज्यादा गर्मी, पानी की कमी...
आप ने पीपल के बारे बहुत अच्छा लिखा.
धन्यवाद

रविकांत पाण्डेय said...

आपके ब्लाग पर आकर अच्छा लगा। एक निवेदन है, पीपल के पत्ते वाली सबसे उपर की फोटो मैं अपने ब्लाग पर लगाना चाहता हूं। आपका reference दे दूंगा. फ़िर भी यदि आपको आपत्ति हुई तो हटा दूंगा।

darvin said...

bhut achhi bate hain

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