Friday, June 19, 2009

बिच्छू -- शर्मीला निशाचर प्राणी


बिच्छू का नाम सुनते ही हमारे शरीर में सिहरन सी दौड़ जाती है। "ये जहरीले और खतरनाक हैं!" हमारा अचेतन मन बिच्छू को देखते ही चीख उठता है। बिच्छू को हम इतनी इज्जत की नजर से उसके जहरीले डंक के कारण ही देखते हैं। यह डंक, जो उसकी पूंछ के सिरे पर होता है, मनुष्य को दिनों तक भयंकर पीड़ा दे सकता है, और कभी-कभी उसकी मृत्यु का कारण भी बन सकता है।

बिच्छुओं की अनेक बातें दिलचस्प हैं। वे कीट नहीं हैं, जैसा कि भ्रमवश समझ लिया जाता है, किंतु "संधिपाद" नामक जीव-समूह के प्राणी हैं। इस समूह में मकड़ी, कनखजूरा, रामघोड़ी आदि जीव शामिल हैं। इन सबके छह से अधिक पैर होते हैं। कीटों में पैरों की संख्या हमेशा छह होती है।

बिच्छू बड़े आकार के जीवों में गिने जाएंगे। सबसे बड़े बिच्छू की लंबाई लगभग २० सेंटीमीटर होती है। ज्यादातर वे भूरे रंग के होते हैं, लेकिन कभी-कभी उनका शरीर का रंग हरा, काला या नीलापन लिए भी हो सकता है। विश्व में ६०० से भी अधिक जाति के बिच्छू हैं।

बिच्छुओं के चार जोड़े पैर होते हैं और ये उसे काफी ध्रुतगति से चलने में सहायता करते हैं। किंतु बिच्छू सामान्यतः धीमी गति से रेंगते हैं। छेड़े जाने पर ही वे फुर्ती दिखाते हैं। शिकार को भी वे छल से ही पकड़ना पसंद करते हैं, दूर तक शिकार का पीछा करने की आदत उनमें नहीं है। संध्याकाल में बिच्छू सर्वाधिक सक्रिय होते हैं।

बिच्छू की कुछ जातियां आगे के दो पैरों को जबड़ों के साथ रगड़कर ध्वनि करती हैं। यह ध्वनी झिंगुरों, और टिड्डों द्वारा निकाली गई ध्वनि से भिन्न होती है और उसका उद्देश्य शत्रुओं और प्रतिद्वंद्वियों को आक्रमण से पहले सचेत करना होता है।

बिच्छू मांसाहारी प्राणी हैं। वे पतिंगे, मक्खी, चींटी, भृंग, मकड़ी आदि को खाते हैं। बड़ी जाति के बिच्छू छिपकली और छोटे चूहों को भी पकड़ सकते हैं। शिकार को उनके मजबूत जबड़े फाड़ डालते हैं और वे उसके शरीर के रसों को चूस लेते हैं। उनके भोजन करने की प्रक्रिया बहुत धीमी होती है और एक छोटे से कीड़े को पूरा समाप्त करने में उन्हें कई घंटे लग जाते हैं।

बिच्छुओं के डरावने रूप को देख कर लोगों को लग सकता है कि उनके कोई शत्रु नहीं होते होंगे। किंतु यह सत्य नहीं है। कई प्रकार की मकड़ियां, छिपकली, सांप, पक्षी और बंदर उन्हें चाव से खाते हैं। बिच्छुओं को उनके ही भाई-बंधुओं से भी डरना पड़ता है क्योंकि वे स्वजातिभक्षी होते हैं।

बिच्छू अंडें नहीं देते, जीवित बच्चों को जनमते हैं। ये बच्चे मादा की पीठ पर चढ़कर बैठ जाते हैं और पर्याप्त बड़े होने तक वहीं रहते हैं। कुछ बिच्छुओं की आयु पांच वर्ष होती है।

बिच्छू शर्मीले जीव होते हैं जो आत्मरक्षा के लिए ही काटते हैं। कपड़ों, जूतों और अलमारियों में छिपने की उनकी आदत के कारण ही अधिकांश दुर्घटनाएं होती हैं।

जन-मानस में बिच्छू को एक कृतघ्न प्राणी की संज्ञा दी गई है। वह ऐसा जीव है जो उसे खिलानेवाले के हाथ को ही काट लेता है। किसी को बिच्छू कह देना उसकी घोर कृतघ्नता को धिक्कारना है। लेकिन मनुष्य सुलभ विशेषताओं को जीव-जंतुओं पर आरोपित करना उचित नहीं है। सोचने-समझने की क्षमता से शून्य ये जीव इस प्रकार की भावनाएं नहीं दर्शा सकते। बिच्छू, या कोई अन्य प्राणी, यदि काटता है तो आत्मरक्षा के लिए ही, न कि किसी द्वेष भावना से।

5 comments:

P.N. Subramanian said...

बस्तर के दंतेवाडा नाम के कसबे में इनका साम्राज्य ही है. इनका डंक वास्तव में अत्यधिक पीडा दायक होता है. सुन्दर जानकारी के लिए आभार

परमजीत बाली said...

अच्छी जानकारी दी है आभार।

राज भाटिय़ा said...

लेकिन इस के डंक से मोत नही होती, लेकिन आदमी डर से ही मर जाता है.
आप ने बहुत अच्छी जनकारी दी.
धन्यवाद

मुझे शिकायत है
पराया देश
छोटी छोटी बातें
नन्हे मुन्हे

अल्पना वर्मा said...

hamen जंतु विज्ञान के practicles में इस का डिस्सेकशन karwaya gaya था[rajsthan mein]..tab इस प्राणी के बारे में जानकारी मिली थी.
आप के इस लेख को पढ़ कर jaankari refresh hui aur कॉलेज के दिनों की यादें bhi ताज़ा हो गयीं.

Unknown said...

थैंक यू सर Bichhoo खाने के बारे में बताने के लिए भाई घर पर एक बिच्छू मिला है उसी को खाना खिलाना था चलिए ठीक है फिर अच्छी जानकारी थी थैंक्स

Post a Comment

 

हिन्दी ब्लॉग टिप्सः तीन कॉलम वाली टेम्पलेट