Saturday, June 20, 2009

चींटी -- छोटी पर मेहनती


हर समय हम चींटियों को नजरअंदाज करते हैं, उन्हें पैरों तले कुचल देते हैं और उन्हें काटनेवाले दुष्टों से अधिक कुछ नहीं समझते। किंतु चींटी बहुत ही मेहनती जीव होती है और उसके जीवन में अद्भुत हद तक एकता की भावना पाई जाती है।

भोजन की तलाश में इधर-उधर भटकता यह छोटा-सा जीव दुनिया के किसी भी कोने में दिखाई दे जाता है। चाहे गरम देश हों या ठंडे, चींटी बाग-बगीचों, पेड़ों और घरों में भी मिल जाएगी। केवल ध्रुवीय प्रदेशों और पर्वतों की ऊंची चोटियों में, जो सदा बर्फ से ढंके रहते हैं, चींटी नहीं होती।

विश्वभर में चींटियों की लगभग १४,००० जातियां पाई जाती हैं। ये १ मिलीमीटर से लेकर ४ सेंटीमीटर तक की लंबाई की होती हैं। जिन चींटियों को हम सबसे अधिक पहचानते हैं, उनमें हैं काली चींटी, मकोड़ा, पेड़ों पर रहनेवाली लाल चींटी जो काटने के लिए मशहूर है और छोटी काली चींटी जो गुड़ आदि मीठी चीजों की ओर अद्भुत आकर्षण दर्शाती है।

चींटियों की दुनिया में नर चींटियों की भूमिका बहुत थोड़ी होती है। उनका जीवनकाल भी अल्प समय का होता है। नर मानसून के तुरंत बाद प्रकट होते हैं, सामान्यतः पहली बौछार के बाद। हमारे ध्यान में वे तब आते हैं जब घर की रोशनी से आकृष्ट होकर वे कमरों में प्रवेश करने लगते हैं। नर का बस एक काम होता है, मादा से समागम करना। इसके बाद उसकी मृत्यु हो जाती है। नर परयुक्त होते हैं। वे भारी संख्या में अपने घोंसले से दूर किसी स्थल पर एकत्र होते हैं। फिर वे अपने शरीर से एक वाष्पशील तरल छोड़ते हैं जो मादा चींटियों और अन्य नरों को आकर्षित करता है। जैसे ही कोई मादा चींटी प्रकट होती है, कई नर उसका आलिंगन करते हैं और एक उससे समागम करके मादा के उदर में शुक्राणुओं को पहुंचा देता है। बाद में अन्य नर भी ऐसा ही करते हैं। इस प्रकार जल्द ही मादा का उदर शुक्राणुओं से भर जाता है। मादा से समागम करने के बाद नर चींटियां एकएक करके मरने लगती हैं, क्योंकि उनकी अब कोई आवश्यकता नहीं होती। मादा चींटी कहीं दूर जाकर अपने जबड़ों से नोचकर या किसी सख्त सतह से रगड़कर अपने पंखों को उखाड़ देती है। वह अब रानी चींटी कहलाती है और स्वयं घोंसला आरंभ करने में सक्षम होती है।

रानी चींटी का मुख्य कर्तव्य हजारों की संख्या में अंडे देना होता है। इसे वह दस-पंद्रह सालों तक निरंतर पूरा करती है। उसे दोबारा नर से समागम नहीं करना प़ड़ता क्योंकि प्रथम उड़ान के दौरान जो शुक्राणु उसने संचित कर लिए थे, वे उम्र भर काम आते हैं। पहली बार दिए गए अंडों के फटने तक रानी चींटी कुछ नहीं खाती। उसके शरीर में मौजूद चर्बी और उड़नपेशियों के गलने से ही उसे आवश्यक ऊर्जा प्राप्त होती रहती है।

रानी द्वारा प्रथम बार जो अंडे दिए जाते हैं, उनसे निकलती हैं श्रमिक चींटियां, जो रानी की देखभाल में लग जाती हैं। वे घोंसले के रखरखाव की सारी जिम्मेदारी को भी अपने ऊपर ले लेती हैं। अब रानी आहार ग्रहण करना प्रारंभ करती है और श्रमिक चींटियां उनके द्वारा एकत्र किए गए भोज्य पदार्थों में से सबसे स्वादिष्ट टुकड़े रानी को खिलाती हैं।

सभी श्रमिक चींटियां मादाएं होती हैं, हालांकि उनमें प्रजनन की क्षमता नहीं रहती। वे कई आकारों की होती हैं। सबसे बड़ी सैनिक चींटियां होती हैं। ये घोंसले की रखवाली करती हैं। इनका सिर बड़ा होता है और जबड़े मजबूत होते हैं। ये अन्य श्रमिक चींटियों की भी मदद करती हैं।

श्रमिक चींटियां भोजन की तलाश करती हैं और नन्हीं चींटियों की देखभाल करती हैं। अंडों से निकली नन्हीं चींटियों के पैर विकसित नहीं होते और वे कीड़े के समान लगती हैं। वे हिलडुल नहीं सकतीं। उन्हें श्रमिक चींटियों द्वारा तब तक खिलाया जाता है जब तक कि वे पूर्ण विकसित न हो जाएं।

सामूहीक प्राणी होने के कारण चींटी सभी कार्यों को बांटकर करती हैं। जो कुछ भी खाद्य पदार्थ मिलता है, उन्हें वे घोंसले में लाती हैं और सब चींटियां मिलकर खाती हैं। इस व्यवहार के कारण समुदाय बिखर नहीं पाता। कुछ चींटियां पानी, मकरंद आदि तरल पदार्थों को घोंसले तक पहुंचाने के लिए औजारों का उपयोग करती हैं। पत्ती, टहनी या मिट्टी के ढेले को वे तरल में रख देती हैं। जब वह तरल को सोख लेता है तो उसे वे घोंसले में ले जाती हैं। लगभग सभी चींटियां घायल जीवों को खाती हैं। इनके अलावा वे पौधों का रस भी पीती हैं। कुछ चींटियां अपने घोंसले में फफूंदी उगाती हैं और खाती हैं।

शृंगिकाएं चींटी की नाक और स्पर्शेंद्रिय होती हैं। इनके सहारे वह गंध का अनुसरण करती है और घोंसले तक अपना रास्ता ढूंढ़ती है। चींटियों के लिए शृंगिकाएं विशेषरूप से महत्वपूर्ण हैं क्योंकि वे लगभग अंधी होती हैं। सभी चींटियां अपने उदर से निकले एक गंध युक्त तरल से जमीन को अंकित करती जाती हैं। इस गंध मार्ग के कारण वे रास्ता नहीं भटकतीं और दूर-दूर विचरने के बाद भी अपने घोंसले पर लौट आती हैं। इतना ही नहीं किसी एक चींटी को भोजन आदि मिलने पर अन्य चींटियां इस गंध मार्ग का अनुसरण करते हुए मिनटों में भोजन तक पहुंच जाती हैं और उसे घोंसले तक खींच लाने में मदद करती हैं।

चींटी बड़े-बड़े समुदायों में रहती है। इन समुदायों में पांच लाख तक चींटियां हो सकती हैं। चींटियों का सामूहीक घोंसला अनेक प्रकार का होता है। वह कहीं भी बनाया जा सकता है, मकानों की नींव में, दीवारों में, वृक्षों की छाल के पीछे, जमीन में या पत्थरों के नीचे। सुपरिचित लाल चींटी अपने समुदाय को किसी ऊंचे पेड़ पर बसाती है। अक्सर यह एक आम का पेड़ होता है। चींटियों के डिंभकों द्वारा बनाए गए रेशम जैसे धागे की सहायता से ये चींटियां पास-पास स्थित पत्तों को चिपका देती हैं। अफ्रीका की दर्जी चींटियां भारत की लाल चींटियों के वर्ग की हैं किंतु उनके द्वारा बनाए गए घोंसले वृक्षों की एक या दो शाखाओं को जोड़ते हैं। बहुधा पास-पास खड़े दो या अधिक पेड़ों की डालियों को जोड़ते घोंसले भी बनाए जाते हैं।

वृक्षों पर रहनेवाली काली चींटी टहनियों पर बड़े-बड़े पगोड़ानुमा घोंसले बनाती है। इन घोंसलों की ऊंचाई १० मीटर तक हो सकती है। ये घोंसले देखने में रेत के बने से लगते हैं, किंतु वास्तव में पत्तों के बने होते हैं। घोंसला बनाने के लिए पत्ते सर्वोत्तम साधन हैं। यह चींटी उनकी सतह पर एक प्रकार के तरल पदार्थ का लेप लगाती है जो उन्हें जलरोधक बना देता है। यह तरल चींटियों के शरीर से स्रवित होता है। कठफोड़वे की एक जाति इन चींटियों के घोंसले में ही अपना नीड़ बनाती है। उसके अंडे, चूजे और अंडों को सेते स्वयं कठफोड़वे को ये खूंखार चींटियां कोई हानि नहीं पहुंचातीं। ऐसा भी नहीं लगता कि इन पक्षियों के कारण चींटियों को कोई लाभ होता हो। फिर भी वे इन पक्षियों को क्यों अपने घोंसले में रहने देती हैं, यह विज्ञान के लिए एक रहस्य बना हुआ है।

कुछ चींटियां घोंसला बनाकर नहीं रहतीं, बल्कि हमेशा एक स्थान से दूसरे स्थान भटकती रहती हैं। इन्हें फौजी चींटी कहा जाता है और ये विशाल टुकड़ियों में विचरती हैं। एक टुकड़ी में दो करोड़ तक चींटियां हो सकती हैं। इस प्रकार की चींटियां सामान्यतः दक्षिण अमरीका और अफ्रीका में पाई जाती हैं।

जब इन चींटियों की फौज चल पड़ती है तो श्रमिक चींटियां आगे-आगे चलकर आसपास के सारे इलाके को छान डालती हैं। जिस रास्ते वे आगे बढ़ती हैं, उसे गंध से अंकित करती जाती हैं। यह अन्य चींटियों के लिए मार्ग दिखाता है। श्रमिक चींटियां अवयस्क चींटियों और अंडों को भी सदा मुंह में लिए फिरती हैं। इन्हें कूच के दौरान ही खिलाया-पिलाया जाता है। रात होने पर ये चींटियां किसी पेड़ की सूराख या जमीन पर बने गड्ढों में सुस्ताती हैं।

फौजी चींटियां मांसाहारी होती हैं। जो भी प्राणी उनकी पकड़ में आ जाए उसे वे खा जाती हैं। उनकी एक कुमुक ने एक बार तीन बकरियों को दो दिनों में चट कर लिया था। इससे भी अविश्वसनीय बात "इन्सेक्ट्स ऑफ द वल्ड" नामक पुस्तक में दर्ज मिलती है। सन १९७३ में इन चींटियों की एक सेना ब्राजील के एक छोटे कसबे में घुस आई और अनेक लोगों को खा गई। इन बदकिस्मत लोगों में उस कसबे का पुलिस अधीक्षक भी शामिल था !

4 comments:

अल्पना वर्मा said...

चींटियों के विषय में खासकर उनके सामजिक jeevan पर बहुत अद्भुत और ज्ञानवर्धक जानकारी.

धन्यवाद.

राज भाटिय़ा said...

बहुत ही ग्याण बर्धक बात बताई आप ने इन चींटियो के बारे.
धन्यवाद
मुझे शिकायत है
पराया देश
छोटी छोटी बातें
नन्हे मुन्हे

परमजीत बाली said...

बहुत ज्ञानवर्धक आलेख है।आभार।

गिरिजेश राव said...

अन्ना, नरों की चींटी समाज में दुर्दशा तो ज्ञात थी। लेकिन आप ने इतने विस्तार से बता कर दु:खी कर दिया। मानव समाज में भी अब नर के दुर्दिन आने की आहट दे रहे हैं।

पितृसत्तात्मक समाज में'पिता दिवस' भी मनाना पड़ेगा, सोचा न था!

श्रम का शोषण चींटी समाज में भी है और इस लिहाज से यह मातृसत्तात्मक समाज निहायत ही सामंतवादी टाइप का है। मुझे तो मानव समाज के मातृसत्तात्मक होने की सम्भावना से ही डर लगने लगा है।

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