Thursday, June 11, 2009

क्या घड़ियाल सचमुच रोते हैं?

घड़ियाल


कुदरतनामा के एक पिछले पोस्ट की टिप्पणी में गिरिजेश राव (इस बार नाम सही लिया है, आलसी जी!) ने पूछा है, घड़ियाली आंसू का राज क्या है, क्या डायनोसर रोने में सक्षम थे?

सवाल रोचक है, इसलिए थोड़ी खोजबीन की। जो मुझे जानने को मिला, उसे यहां दे रहा हूं।

घड़ियाली आंसू वाली कहावत हिंदी और अंग्रेजी दोनों में विद्यमान है, और समान अर्थ रखती है, यानी कपटपूर्ण ढंग से सांत्वना दर्शाना। अंग्रेजी की यह कहावत सैकड़ों साल पुरानी है। हिंदी की यह कहावत कितनी पुरानी है, यह अजीत वाडनेकर ही बता सकते हैं। यह भी पता नहीं है कि यह कहावत हिंदी से अंग्रेजी में पहुंची है, ठग, बकशीश, आदि बीसियों हिंदी शब्दों के समान, या अंग्रेजी से ही हिंदी में आ धमकी है। इन सब विषयों की चर्चा अजीत जी के जिम्मे छोड़ते हुए घड़ियाली शोक के विषय पर आता हूं।

क्या घड़ियाल सचमुच रोते हैं, यानी आसूं बहाते हैं? इसका जवाब है, कि हां, घड़ियालों की आंखों में आसूं पैदा करनेवाले अवयव होते हैं, और उनकी आंखों से आंसू सचमुच टपकते हैं, खासकर जब वे भोजन कर रहे होते हैं।

सवाल है, इसका कारण क्या है, घड़ियाल आंसूं क्यों बहाते हैं? प्रकृति विदों ने इस गुत्थी पर काफी विचार किया है। पुराने प्रकृति विदों का जवाब यह था कि घड़ियाल जब अपने शिकार को खा रहा होता है, तो उसे उसका शिकार बने जीव की याद आती है और उसके मर जाने पर इतना दुख हो आता है, कि वह अपने आंसूं रोक नहीं पाता, हालांकि शिकार को मारा उसी ने होता है।

यह जवाब रोचक है, पर हमें संतुष्ट नहीं करता, क्योंकि घड़ियाल में इस तरह की विचारणा क्षमता हो नहीं सकती, उसका मस्तिष्क इतना विकसित ही नहीं है। जानवरों को वह अपनी भूख मिटाने के लिए मारता है, न कि किसी द्वेष भावना से। इस तरह की मानव भावनाएं जानवरों में आरोपित करना प्राचीन मानव की एक पुरानी आदत रही है। मनुष्य को चुनौती देनेवाले जानवरों को बुरा बना देना और जो उससे सहयोग करे, उन्हें मिहिमा-मंडित करना, मनुष्य की प्रवृत्ति रही है। इस तरह घड़ियाल, भेड़िए, सांप आदि बुरे जानवर बन गए हैं और हाथी, गाय, हंस आदि अच्छे। कुछ, जैसे गाय, लंगूर आदि देवता की पदवी भी प्राप्त कर गए हैं।

हमारे प्रश्न के इस अवैज्ञानिक उत्तर पर और समय न बिगाड़कर कुछ अन्य अधिक वैज्ञानिक उत्तरों की ओर बढ़ते हैं।

कुछ वैज्ञानिकों का मानना है कि भोजन करते समय घड़ियाल आंसूं इसलिए निकालता है क्योंकि उसकी आंसूं में ऐसे कुछ एन्जाइम होते हैं, जो भोजन को मुलायम बना देते हैं, जिससे भोजन निगलना घड़ियाल के लिए आसान हो जाता है। आंसूं आंखों से तो निकलते ही है, लेकिन चूंकि आंसूं की ग्रंथियां नासिका और मुंह से भी जुड़ी होती हैं, आंसूं मुंह के अंदर भी फैल जाता है। पर बारीकी से विचार करने पर यह उत्तर भी कुछ जंचता नहीं है - घड़ियाल अपने भोजन को आमतौर पर पानी में ही खाता है, और खाते समय उसके मुंह में भारी मात्रा में पानी विद्यमान रहता है। इसकी तुलना में चंद बूंद आंसू भोजन को कहां तक मुलायम कर पाएंगे, यह विचारणीय है।

एक तीसरा टेक यह है कि जब घड़ियाल भोजन करता है, तो शिकार को निगलने की कोशिश में आंसू लानेवाली ग्रंथियां दब जाती हैं, जिससे उनमें मौजूद आंसूं बाहर आ जाता है। यह समाधान सबसे संतोषजनक लगता है।

ध्यान रहे कि घड़ियालों में और मगरों में भी आंखों में तीन पलकें होती हैं। ऊपरी पलक, निचली पलक और इन दोनों के नीचे एक और पलक, जो पारदर्शी होती है। यानी, पूरे भोलेनाथ होते हैं ये विशाल सरीसृप! पानी के नीचे रहने पर घड़ियाल इस तीसरी पलक को आंखों पर चढ़ा लेता है। आंसू का प्रयोजन इस पलक को अच्छी तरह चिकना बनाए रखना होता है, ताकि वह आसानी से आंखों पर चढ़ाया जा सके।

घड़ियाली आंसू का एक अन्य कारण भी बताया जाता है, जो दरअसल खारे पानी में रहनेवाले मगर (सोल्टवाटर क्रोकोडाइल) पर अधिक खरा उतरता है। कहा जाता है कि घड़ियाल में पसीना बहाने की व्यवस्था नहीं होती, जैसा कि स्तनधारी, गरम खूनवाले प्राणियों में होती है। इससे वह अपने खून में जमा हुए नमक को पसीना बहाकर बाहर नहीं निकाल पाता। इसके बदले वह आंसूं बहाकर अपने खून में विद्यमान अतिरिक्त नमक से छुटकारा पा लेता है। आंसूं में लवणांश की अधिकता होती है।

समुद्री कच्छपों में भी अतिरिक्त नमक से छुटकारा पाने की यही व्यवस्था पाई जाती है, यानी आंसूं बहाकर।

कहने का मतलब है कि घड़ियाल ही नहीं समुद्री कच्छप भी रोने में कुशल होते हैं, हालांकि उनके संबंध में कोई कहावत नहीं बन पाई है।

अब रहे डायनोसर। क्या वे भी इमोशनल टाइप के थे? इस सवाल का उत्तर देना थोड़ा कठिन है क्योंकि डायनोसरों के जितने अवशेष अब तक मिल पाए हैं, वे कुछ पत्थर में बदल चुकी उनकी कुछ हड्यियां मात्र हैं। इनके आधार पर यह कह पाना कि वे रो सकते थे या नहीं, जरा मुश्किल है।

इसलिए यह सवाल हम स्टीवन स्पीलबर्ग पर छोड़ देते हैं। वे शायद अपनी किसी अगली फिल्म में (जुरैसिक पार्क 4?) इस पर प्रकाश डालें!

5 comments:

अजय कुमार झा said...

iska matlab patthe ko munh mein thoonste wakt jabaran hee rona padta hai...achha ..ye to pata chal gaya kya ye bhee pata chal saktaa hai ki gainde ko gudgudee hotee hai....?ha..ha...ha..

RAJNISH PARIHAR said...

बहुत ही अच्छी रचना...

Arvind Mishra said...

मेरी रूचि के विषयों पर लिखते हैं आप ! लेकिन अब तो घडियाली आंसू असली हैं -कितनी तेजी से लुप्त हो रहे बिचारे !

गिरिजेश राव said...

लुप्त नहीं हो रहे बल्कि चोला बदल कर संसद, विधान सभा, विधान परिषद, नगरपालिका, समितियों, ग्राम पंचायतों.... आदि में बैठ रहे हैं और बहुतेरे इसके लिए प्रयासरत हैं। ;)

यह लेख आज 'अमर उजाला' में छपा है।

बधाई

Nirmla Kapila said...

बहुत बडिया जानकारी आभार्

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