Monday, August 17, 2009

पर्यावरण समस्या और समाधान

सामान्य जीवन प्रक्रिया में जब अवरोध होता है तब पर्यावरण की समस्या जन्म लेती है। यह अवरोध प्रकृति के कुछ तत्वों के अपनी मौलिक अवस्था में न रहने और विकृत हो जाने से प्रकट होता है। इन तत्वों में प्रमुख हैं जल, वायु, मिट्टी आदि। पर्यावरणीय समस्याओं से मनुष्य और अन्य जीवधारियों को अपना सामान्य जीवन जीने में कठिनाई होने लगती है और कई बार जीवन-मरण का सवाल पैदा हो जाता है।

प्रदूषण भी एक पर्यावरणीय समस्या है जो आज एक विश्वव्यापी समस्या बन गई है। पशु-पक्षी, पेड़-पौधे और इंसान सब उसकी चपेट में हैं। उद्योगों और मोटरवाहनों का बढ़ता उत्सर्जन और वृक्षों की निर्मम कटाई प्रदूषण के कुछ मुख्य कारण हैं। कारखानों, बिजलीघरों और मोटरवाहनों में खनिज ईंधनों (डीजल, पेट्रोल, कोयला आदि) का अंधाधुंध प्रयोग होता है। इनको जलाने पर कार्बन डाइआक्साइड, मीथेन, नाइट्रस आक्साइड आदि गैसें निकलती हैं। इनके कारण हरितगृह प्रभाव नामक वायुमंडलीय प्रक्रिया को बल मिलता है, जो पृथ्वी के तापमान में वृद्धि करता है और मौसम में अवांछनीय बदलाव ला देता है। अन्य औद्योगिक गतिविधियों से क्लोरोफ्लोरोकार्बन (सीएफसी) नामक मानव-निर्मित गैस का उत्सर्जन होता है जो उच्च वायुमंडल के ओजोन परत को नुकसान पहुंचाती है। यह परत सूर्य के खतरनाक पराबैंगनी विकिरणों से हमें बचाती है। सीएफसी हरितगृह प्रभाव में भी योगदान करते हैं। इन गैसों के उत्सर्जन से पृथ्वी के वायुमंडल का तापमान लगातार बढ़ रहा है। साथ ही समुद्र का तापमान भी बढ़ने लगा है। पिछले सौ सालों में वायुमंडल का तापमान 3 से 6 डिग्री सेल्सियस बढ़ा है। लगातार बढ़ते तापमान से दोनों ध्रुवों पर बर्फ गलने लगेगी। अनुमान लगाया गया है कि इससे समुद्र का जल एक से तीन मिमी प्रतिवर्ष की दर से बढ़ेगा। अगर समुद्र का जलस्तर दो मीटर बढ़ गया तो मालद्वीप और बंग्लादेश जैसे निचाईवाले देश डूब जाएंगे। इसके अलावा मौसम में बदलाव आ सकता है - कुछ क्षेत्रों में सूखा पड़ेगा तो कुछ जगहों पर तूफान आएगा और कहीं भारी वर्षा होगी।

प्रदूषक गैसें मनुष्य और जीवधारियों में अनेक जानलेवा बीमारियों का कारण बन सकती हैं। एक अध्ययन से ज्ञात हुआ है कि वायु प्रदूषण से केवल 36 शहरों में प्रतिवर्ष 51,779 लोगों की अकाल मृत्यु हो जाती है। कलकत्ता, कानपुर तथा हैदराबाद में वायु प्रदूषण से होने वाली मृत्युदर पिछले 3-4 सालों में दुगुनी हो गई है। एक अनुमान के अनुसार हमारे देश में प्रदूषण के कारण हर दिन करीब 150 लोग मरते हैं और सैकड़ों लोगों को फेफड़े और हृदय की जानलेवा बीमारियां हो जाती हैं।
उद्योगीकरण और शहरीकरण से जुड़ी एक दूसरी समस्या है जल प्रदूषण। बहुत बार उद्योगों का रासायनिक कचरा और प्रदूषित पानी तथा शहरी कूड़ा-करकट नदियों में छोड़ दिया जाता है। इससे नदियां अत्यधिक प्रदूषित होने लगी हैं। भारत में ऐसी कई नदियां हैं, जिनका जल अब अशुद्ध हो गया है। इनमें पवित्र गंगा भी शामिल है। पानी में कार्बनिक पदार्थों (मुख्यतः मल-मूत्र) के सड़ने से अमोनिया और हाइड्रोजन सलफाइड जैसी गैसें उत्सर्जित होती हैं और जल में घुली आक्सीजन कम हो जाती है, जिससे मछलियां मरने लगती हैं। प्रदूषित जल में अनेक रोगाणु भी पाए जाते हैं, जो मानव एवं पशु के स्वास्थ्य के लिए बड़ा खतरा हैं। दूषित पानी पीने से ब्लड कैंसर, जिगर कैंसर, त्वचा कैंसर, हड्डी-रोग, हृदय एवं गुर्दों की तकलीफें और पेट की अनेक बीमारियां हो सकती हैं, जिनसे हमारे देश में हजारों लोग हर साल मरते हैं।

एक अन्य पर्यावरणीय समस्या वनों की कटाई है। विश्व में प्रति वर्ष 1.1 करोड़ हेक्टेयर वन काटा जाता है। अकेले भारत में 10 लाख हेक्टेयर वन काटा जा रहा है। वनों के विनाश के कारण वन्यजीव लुप्त हो रहे हैं। वनों के क्षेत्रफल में लगातार होती कमी के कारण भूमि का कटाव और रेगिस्तान का फैलाव बढ़े पैमाने पर होने लगा है।

फसल का अधिक उत्पादन लेने के लिए और फसल को नुकसान पहुंचाने वाले कीटों को मारने के लिए कीटनाशकों का उपयोग किया जाता है। अधिक मात्रा में उपयोग से ये ही कीटनाशक अब जमीन के जैविक चक्र और मनुष्य के स्वास्थ्य को क्षति पहुंचा रहे हैं। हानिकारक कीटों के साथ मकड़ी, केंचुए, मधुमक्खी आदि फसल के लिए उपयोगी कीट भी उनसे मर जाते हैं। इससे भी अधिक चिंतनीय बात यह है कि फल, सब्जी और अनाज में कीटनाशकों का जहर लगा रह जाता है, और मनुष्य और पशु द्वारा इन खाद्य पदार्थों के खाए जाने पर ये कीटनाशक उनके लिए अत्यंत हानिकारक सिद्ध होते हैं।

आज ये सब पर्यावरणीय समस्याएं विश्व के सामने मुंह बाए खड़ी हैं। विकास की अंधी दौड़ के पीछे मानव प्रकृति का नाश करने लगा है। सब कुछ पाने की लालसा में वह प्रकृति के नियमों को तोड़ने लगा है। प्रकृति तभी तक साथ देती है, जब तक उसके नियमों के मुताबिक उससे लिया जाए।

एक बार गांधीजी ने दातुन मंगवाई। किसी ने नीम की पूरी डाली तोड़कर उन्हें ला दिया। यह देखकर गांधीजी उस व्यक्ति पर बहुत बिगड़े। उसे डांटते हुए उन्होंने कहा, ''जब छोटे से टुकड़े से मेरा काम चल सकता था तो पूरी डाली क्यों तोड़ी? यह न जाने कितने व्यक्तियों के उपयोग में आ सकती थी।'' गांधीजी की इस फटकार से हम सबको भी सीख लेनी चाहिए। प्रकृति से हमें उतना ही लेना चाहिए जितने से हमारी मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति हो सकती है। पर्यावरणीय समस्याओं से पार पाने का यही एकमात्र रास्ता है।

9 comments:

पी.सी.गोदियाल said...

बालसुब्रमनियम जी, आपने पर्यावरण पर बहुत अच्छी जानकारियाँ दी है, और मेरा मानना है कि भूतकाल में काश इस दुनिया ने पर्यावरणविदो की बात अनसुनी ना की होती तो शायद यह भयावह स्थिति आज पैदा नहीं होती! लेकिन आज जब हम दुनिया भर में इसके लिए एक दुसरे पर दोष मढ़ते है तो क्या कभी हमने खुद के स्तर पर सोचा कि हमने इसे बचाने के लिए क्या प्रयास किया ?

एक बात जो आपने अपने लेख में छोड़ दी, और जिसे मै पिछले दस-पन्द्रह सालो में पर्यावरण के नुकशान में सबसे अधिक जिम्मेदार मानता हूँ, वह है कृषी और वन वाली भूमि में इंसानों द्बारा अप्रत्याशित रूप से कंक्रीट के जंगल बसाना ! इसके लिए ना सिर्फ बिल्डर्स और भूमाफिया अपितु आम इंसान और सरकार सबसे ज्यादा जिम्मेदार है ! क्या हमने कभी सोचा कि आज जो हम खाद्यानों की कमी से जूझ रहे है उसके लिए ये कंक्रीट के जंगल सबसे ज्यादा जिम्मेदार है ! भरष्ट नेता और भूमाफिया रातोरात करोड़पति बनने के लिए मूर्ख जनता को "एक घर हो सभी का" का नारा दे रहे है ! पर क्या आपने सोचा कि आज के युग में जब एक छोटा सा फलत भी ३० लाख से नीचे नहीं है तो एक आम आदमी उसे खरीदेगा कैसे ? वास्तविकता यह है कि हमारे ये जितने भी भरष्ट नेता, कानून के रखवाले, न्याय के मंदिरों के रखवाले और पूंजी पति है ये अपनी भरष्ट कमाई को यहाँ लगाना सबसे आसान तरीका समझते है और एक-एक की जांच की जाए तो हर एक भ्रष्ट इंसान २०-२० फ्लातो का मालिक है और फिर ऊँचे दामो पर जरुरतमंदो को बेचकर अपना घर भरता है ! क्या आज तक किसी पर्यावरण विद या आम जनता ने इस जानबूझकर सोई हुई सरकार से इसे रोकने के लिए आवाज उठाई?
अफ़सोस के साथ कहना पड़ता है कि नहीं !

AlbelaKhatri.com said...

SIR,
AAJKAL GAANDHIJI JAISE LOG RAHE HI KAHAAN HAIN
JO ITNAA BAAREEK SOCH SAKE...........

PRADOOSHAN K KAARAN JEENA MUHAAL HO GAYA HAI
AISE ME AAPKA YE AALEKH SATEEK AUR SAARTHAK
HAI...
BADHAAI !

गर्दूं-गाफिल said...

सुब्रमण्यम जी
आप इतना सारगर्भित ,उपयोगी और तेज लिखते हैं की आप का अभिनन्दन करने को मन करता है
चूंकि मै कोई संस्था नहीं हूँ इसलिए आप मेरी इस टिप्पणी को ही अपना अभिनन्दन मान कर बधाई स्वीकार कीजिये शुभ कामनाओं सहित

Anonymous said...

क्या आप कोई साहित्यिक पत्रिका भी निकलते है ?
यदि हाँ तो आपके लिए एक सूचना है
अखिल भारतीय साहित्य परिषद् १२-१३ सितम्बर को राष्ट्रीय विचार की पत्रिकाओं के सम्पादकों का सम्मेलन दिल्ली में करने जा रही है कृपया अपनी पत्रिका की प्रति निम्नलिखित पते पर शीघ्र भेजें ताकि आमंत्रित किया जा सके

राष्ट्रीय सह संगठन मंत्री
अखिल भारतीय साहित्य परिषद्
राष्ट्रोत्थान न्यास भवन
नई सड़क ,लश्कर
ग्वालियर ४७४००१ (मध्यप्रदेश )

कविता said...

Subramaniyam ji, aap kahaan kho gaye?

Science Bloggers Association said...

Is shamaa ko jalaaye rakkhen.
-Zakir Ali ‘Rajnish’
{ Secretary-TSALIIM & SBAI }

paad said...

it is gobar

Anonymous said...

great

Anonymous said...

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COOL
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