Monday, August 3, 2009

मल-मूत्र से भोजन

जापानी वैज्ञानिकों ने शहरों के नालों में बहते मल-मूत्र को प्रोटीन-युक्त पदार्थ में बदलने में सफलता हासिल की है। यह पदार्थ देखने में मांस के समान लगता है और उन्हें आशा है कि वे जल्द ही उसमें मांस की जैसी सुगंध भी भर सकेंगे। इन वैज्ञानिकों ने इस विश्वास को लेकर काम आरंभ किया था कि जो चीज हमारे शरीर से निकलती है, उसे पुनश्चक्रित करके शरीर में ही लौटाना संभव होना चाहिए।

मल-मूत्र को पहले खाद में बदल लिया जाता है, फिर उसमें सोयाबीन, नमक, मिर्च, हींग आदि स्वादवर्धक पदार्थ मिलाए जाते हैं। इन वैज्ञानिकों का मानना है कि यह पदार्थ मनुष्य के खाने लायक न भी बन सके, इसे मवेशियों को खिलाया जा सकेगा।

10 comments:

Arvind Mishra said...

जघन्य कृति !

shantanu said...

घोर कलयुग है...

गिरिजेश राव said...

इस तरह की खुराफातों के अच्छे फल भी होते हैं। प्रक्रिया में ऐसी तमाम समांतर खोजें होती हैं जो मानव मात्र के लिए कल्याणकारी होती हैं।
इस तरह के अन्वेषण में वही सभ्यता लग सकती है जिसने सभी पारम्परिक विषयों पर काम कर लिया हो और बहुत आगे निकल चुकी है। तभी तो इसके लिए समय और संसाधन आएँगें।

किसी भी जीव को ऐसा खाद्य खिलाना जघन्य ही होगा।

AlbelaKhatri.com said...

he bhagwaan !

dhnyavaad tera ki tune mujhe jaapaan me janm nahin diya...
apan toh bharat me hi bhale bhai............

आलोक सिंह said...

जो न हो जाये वो कम है , अब क्या कहे

महामंत्री - तस्लीम said...

Apshisht padarthon ko punah upyog men laana, bhojan ki seemitta ka ek vikalp ho sakta hai.
-Zakir Ali ‘Rajnish’
{ Secretary-TSALIIM & SBAI }

P.N. Subramanian said...

घनघोर अघोर पन्त स्थापित हो जावेगा.

परमजीत बाली said...

अभी तो ना जानें और क्या क्या देखने को मिलेगा.....इंसानी बुद्धि हर चीज से लाभ उठाना चाहती है,,,लेकिन परिणाम क्या होगें.....यह अभी भविष्य के गर्त मे है।

Pt.डी.के.शर्मा"वत्स" said...

हे प्रभु!!
फिर भी लोग कहते हैं कि हमारा विज्ञान महान्!!!

अनुनाद सिंह said...

जब परमाणु से इतनी उर्जा निकल सकती है तो अपशिष्ट से भोजन निकलने में किसी को आश्चर्य क्यों होता है। पे।द-पौधे तो यह कार्य करते आ रहे हैं। अब आदमी भी कर सकेगा।

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