Friday, August 7, 2009

किसान और पशुपालक का परस्पर लाभदायी संबंध

सौराष्ट्र में राजकोट के पास रहनेवाले भारवाड़ पशुपालकों की रेवड़ों में 90 प्रतिशत भेड़ और 10 प्रतिशत बकरियां रहती हैं। एक रेवड़ में 50-250 जानवर होते हैं। भेड़ों से ऊन प्राप्त होता है जो कंबल और गलीचे बनाने के लिए उत्तम होते हैं। भेड़ों से दूध, मांस और मींगनियां भी प्राप्त होती हैं जिनकी बिक्री से भी आमदनी होती है। बकरियों के दूध का उपयोग भारवाड़ स्वयं कर लेते हैं।

सूखे के मौसम में भारवाड़ पशुपालक उत्तर गुजरात के पानी बहुल इलाकों में अपनी भेड़-बकरियों के साथ चले जाते हैं। यहां के किसानों के पास सामान्यतः 1-3 हेक्टेयर की भूमि होती है। वे वर्षा पर ही अधिकतर निर्भर करते है। यद्यपि लगभग सभी गावों में ट्रेक्टर दिख जाएंगे, परंतु बहुत से किसान बैलों से जुताई करना पसंद करते हैं। खरीफ फसल के रूप में वे मूंगफली बोते हैं, और रबी फसल के रूप में कपास, गेहूं, बाजरा, आदि। ये किसान गोबर खाद मिलाकर ही खेतों की उर्वरता बनाए रखते हैं। कारखाना-निर्मित खाद बहुत कम उपयोग किए जाते हैं। भारवाड़ पशुपालकों के साथ इन किसानों के अच्छे संबंध रहते हैं।

भारवाड़ अपने जानवरों को थोर की जिंदा झाड़ियों से बने बाड़ों में रखते हैं। प्रत्येक बाड़ का क्षेत्रफल 300-600 वर्ग मीटर रहता है। ये बाड़ जानवरों की लीद व मींगनियां एकत्र करने की दृष्टि से बने होते हैं। बाड़ों की फर्श समतल होती है और उस में एक या दो कम-गहरे गड्ढे बने होते हैं, जिनमें पशुओं का मल-मूत्र इकट्ठा किया जाता है।

ये पशुपालक पशुओं को शाम 6 बजे चरागाहों से लाकर इन बाड़ो में बंद करते हैं। अगले दिन सुबह 10 बजे तक ये पशु वहीं रहते हैं। जब पशु सुबह चरागाह जा चुके होते हैं, तब बाड़े की फर्श पर पड़ी मींगनियों को बुहारकर गड्ढों में डाल दिया जाता है। इसे बाद में किसान खरीद ले जाते हैं। सूखे के मौसम के अंत में जब खेत खाली होते हैं, किसान भारवाड़ों की भेड़ों को खेतों में ठहरवाते हैं। इसके बदले किसान या तो भारवाड़ों को नकद में भुगतान करते हैं अथवा जानवरों को फसलों का अवशेष खाने को देते हैं। जानवरों का मल-मूत्र सीधे खेतों में ही गिरता है। इससे खाद को भारवाड़ो के बाड़ों से खेतों तक पहुंचाने का खर्चा बच जाता है। एक अन्य फायदा भी है। फसल अवशिष्टों में मौजूद पोषक तत्वों को कुदरती रूप से यानी जीवाणु, फफूंदी, केंचुए आदि जीवों द्वारा पचाने के बाद मिट्टी में पुनः लौट आने में कई साल लग सकते हैं, लेकिन उन्हीं अवशिष्टों को भेड़-बकरियां अपने पेट में पचाकर चौबीस घंटे में अच्छे खाद में बदलकर खेतों में लौटा देती हैं।

पशुपालक एक बैलगाड़ी मींगियां तीन दिनों में 200 भेड़-बकरियों से जमा कर सकते हैं। इसका वजन 100 किलो के आसपास होता है। इसे वे किसानों को एक बैलगाड़ी बाजरे अथवा गेहूं के भूसे के बदले दे देते हैं। यह 200 छोटे मवेशियों के लिए एक दिन के चारे के बराबर होता है। यह इंतजाम पशुपालकों और किसानों दोनों के लिए लाभदायक है। जहां किसानों को तैयार खाद मिलता है, वहीं भारवाड़ों को नकद और चारा मिल जाता है। किसानों को एक ही बात की शिकायत रहती है। मींगनियों के साथ खरपतवारों के बीज भी खेतों मे पहुंच जाते हैं।

पशु-मल का यह सौदा काफी संगठित तरीके से चलता है। इसे वैज्ञानिक आधार देकर और अधिक कार्यक्षम बनाया जा सकता है। खरपतवारों के बीजों को नष्ट करने के लिए मींगनियों को कंपोस्ट किया जा सकता है। खाद में नाइट्रोजन तत्व की वृद्धि करने के लिए अमोनिया मिलाया जा सकता है, इत्यादि।

बहुत से छोटे किसान रासायनिक उर्वरक खरीद नहीं सकेंगे। उनके लिए देशी खाद का ही आसरा है। इसलिए भारवाड़ और किसान के बीच का जो लाभदायी संबंध है, वह अनुकरणीय है।

2 comments:

गिरिजेश राव said...

अन्ना, कहाँ कहाँ से ढूढ़ कर लाते हैं!
अति उपयोगी, इस देश के लिए भी और हिन्दी के लिए भी। आप हिन्दी को समृद्ध कर रहे हैं। हिन्दी के शांत सैनिक, डँटे हुए जगे सिपाही तुम्हारी जय हो।

चुनिन्दा लेखों को संकलित कर छापिए। वहाँ गुजरात शिक्षा विभाग में दिखाइए। मुझे विश्वास है कि दसवीं तक के कोर्स में कितने ही लेख लग सकते हैं। बहुत कम लोग ऐसा लिख पाते हैं जो वयस्क और बच्चे दोनों के लिए समान रूप से बोधगम्य हो।

Mahesh Sinha said...

बहुत अच्छा प्रकृति चक्र , इसके लिए किसी अनुसन्धान की जरूरत नहीं पड़ी . लोगों ने अपने अनुभव से सीखा . दुनिया को रासायनिक विष के जंगल में ले जाने वाला अमेरिका अब खुद जैविक की ओर कदम बढा रहा है और हमारे लोग यूरिया से दूध बना रहे हैं

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