Sunday, August 16, 2009

पुरा गांव की गोबर गैस परियोजना

पुरा दक्षिण भारत में स्थित एक छोटा सा गांव है। यहां एक अनोखा प्रयोग चल रहा है जो लोगों की जीवन-शैली में क्रांतिकारी परिवर्तन ला रहा है। न तो इस गांव में विकास के नाम पर बड़े-बड़े कारखाने लगाए गए हैं, न उद्योग, परंतु स्थानीय संसाधनों के बेहतर उपयोग पर ध्यान देकर लोगों का जीवन स्तर उठाया जा रहा है। फलतः न तो यहां बड़े उद्योग से संबंधित प्रदूषण आदि की समस्याएं हैं और न ही लोगों को उद्योगों और बांधों के लिए विस्थापित होना पड़ा है।

इस परियोजना में मवेशियों की महत्वपूर्ण भूमिका है। सारे गांव में लगभग ढाई सौ गाएं हैं, यानी प्रति व्यक्ति दो गाएं। गोबर का उपयोग पहले खेतों में मिलाने और ईंधन के रूप में किया जाता था। परंतु अब प्रत्येक घर से गोबर इकट्ठा करके दो पूर्व नियुक्त प्रतिनिधियों को सौंप दिया जाता है। इस गोबर के लिए गांववालों को एक रुपया प्रति पचास किलो गोबर के हिसाब से पैसे भी मिलते हैं। परंतु गांव वालों को मिलने वाला असली मूल्य इस पैसे में नहीं है। हर सुबह सभी घरों से गोबर आ जाने के बाद ये पूर्व नियुक्त प्रतिनिध गोबर को पानी में घोलकर साइफन पद्धति से पांच-पांच मीटर गहरे गर्तों में उंड़ेलते हैं। ये गर्त धातु के ढक्कनों से ढके हैं। गोबर इन गर्तों में सड़ता है और इससे उत्पन्न होती है मीथेन या गोबर गैस।

गोबर गैस का उपयोग एक छोटे विद्युत जनित्र को चलाने के लिए होता है। गांव वालों को सुबह और शाम दो-तीन घंटे के लिए बिजली प्राप्त होती है।

बिजली के आने से गांव वालों को बहुत लाभ हुआ है। पहले महिलाओं को दूर-दूर से पानी लाना पड़ता था। अब बिजली की सहायता से पानी पंप करके एक टंकी में भरा जाता है। इस टंकी के साथ आठ नल जुड़े हैं जिनसे लोगों और मवेशियों को पानी उपलब्ध होता है। घरों में बिजली आ जाने से बच्चे देर रात तक पढ़ सकते हैं। समय-समय पर गर्तों से खाद निकाल लिया जाता है। इसकी उर्वरक क्षमता गोबर से कहीं अधिक होती है। इसे खेतों में मिलाकर पुरा के गांववालों की जमीन अच्छी और उपजाऊ हो गई है।

पुरा गांव की गोबर गैस परियोजना अमुल्या रेड्डी नामक वैज्ञानिक द्वारा विकसित की गई है। उन्होंने पहले गांव वालों की जीवन-शैली का अध्ययन किया और फिर उनकी आवश्यकताओं के अनुसार परियोजना तैयार की। उन्होंने इसका भी ध्यान रखा कि परियोजना के हर स्तर पर लोगों को शामिल किया जाए। पुरा गांव को इस परियोजना के लिए चुने जाने के पीछे तर्क यह था कि यह गांव भारत के एक औसत गांव का प्रतिनिधित्व करता था। इसलिए पुरा की सफलता भारत के हर गांव में दुहराई जा सकती है।

आवश्यकता है तो केवल लोगों को संगठित करने के लिए रेड्डी के समान दृढ़-निश्चयी कार्यकर्ताओं की।

3 comments:

अनुनाद सिंह said...

इस गाँ ने और इस परियोजना के चिन्तकों ने एक अनुकरणीय काम किया है।

गिरिजेश राव said...

अन्ना, यह सब दक्षिण में हो सकता है। लोग मुझे हताश भले कहें, ऐसा पूर्वी उत्तरप्रदेश में तो नहीं हो सकता।

गाँवों में मवेशी बँचे ही नहीं, आप तो प्रति व्यक्ति दो गायों की बात कर रहे हैं। गाँवों को उजड़ने, हाँ मैं यही शब्द चुन रहा हूँ, से रोकने के सर्व पाक्षिक उपाय करने होंगे। जिन गाँवों में जनसंख्या के नाम पर केवल वृद्ध बँचे हों और जवान केवल दशहरा, दिवाली, होली में 'घर' आते हों, उनसे क्या अपेक्षा रखी जा सकती है ?

कम्प्यूटर सेंटर चलाने के लिए एक ढंग का जवान मुझे नहीं मिल पाया। मजबूरन प्राइवेट स्कूल में लगाना पड़ा।
संतोष है कि चल रहा है।

क्षमा कीजिएगा मुझे गुस्सा आ गया।

खुशदीप सहगल said...

बालाभाई, हौसला अफ़जाई के लिए शुक्रिया. मैं आपकी प्रतिभा को सैल्यूट करता हूं. गैर-हिंदीभाषी होते हुए आपने हिंदी में ऐसी महारत हासिल की। ब्लॉग के ज़रिये आपसे मिलना होता रहेगा. मेरी
खामियों की ओर भी इंगित करते रहियेगा.

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