Wednesday, August 12, 2009

पक्षी प्रवास -- प्रकृति का अद्भुत रहस्य

हमारी झीलों-तालाबों में हर साल जाड़ों में तरह-तरह के जो असंख्य जलपक्षी दिखाई देते हैं, उनमें से अनेक हजारों किलोमीटर की कठिन यात्रा करके यूरोप, उत्तरी एशिया आदि ठंडे प्रदेशों से हमारे देश में आते हैं। इन आगंतुकों में दुर्लभ साइबीरियाई सारस, दुनिया का सबसे तेज उड़नेवाला पक्षी बहरी, आकर्षक शिकारी पक्षी मछलीमार, गुलाबी मैना और अनेक प्रकार की बत्तखें शामिल हैं।

प्रवासी पक्षी जाड़ों में हमारे यहां इसलिए आते हैं क्योंकि इस समय उनके अपने देश में जलक्षेत्रों की सतह पर बर्फ जम जाती है और ठिठुरानेवाली ठंड के कारण इन पक्षियों का आहार बनने वाले जीव या तो मर जाते हैं या जमीन में दुबककर शीत-निद्रा में चले जाते हैं, जिससे वे सर्दियों के समाप्त होने के बाद ही जागते हैं। इन इलाकों में सर्दियों में रातें भी लंबी हो जाती हैं और दिन छोटे। इन सब कारणों से पक्षियों के लिए आहार खोजना और जिंदा रहना बहुत मुश्किल हो जाता है और वे उड़ने की अपनी क्षमता का लाभ उठाते हुए भारत जैसे गरम देशों में चले आते हैं जहां बर्फ नहीं जमती और इसलिए आहार की प्रचुरता रहती है। भारत में इस समय वर्षा ऋतु अभी-अभी समाप्त हुई होती है और सभी जलाशय पानी से लबालब भरे होते हैं और सभी जगह हरियाली छाई रहती है। अतः पक्षियों को खुराक आसानी से मिल जाती है।

प्रवास की दिशा मुख्यतः उत्तर से दक्षिण की ओर रहती है। परंतु कुछ पक्षी पूर्व से पश्चिम की ओर भी जाते हैं। नवंबर-दिसंबर तक सभी पक्षी आ जाते हैं। भारत में दो-एक महीना रहकर वे अपने देश लौट पड़ते हैं या आगे बढ़ जाते हैं। सितंबर-अक्तूबर के दौरान पक्षियों का आना और फरवरी-मार्च के दौरान उनका लौट पड़ना युगों-युगों से चली आ रही एक परंपरा है। सितंबर से लेकर मार्च तक हमारे देश के सभी छोटे-बड़े जलाशयों में पक्षियों की तादाद सबसे अधिक होती है।

इन हजारों लाखों पक्षियों को देखकर हमारा मन विस्मित हुए बिना नहीं रहता। ये पक्षी कब और कैसे यहां पहुंचे, यह सवाल हमारे मन में बार-बार कौंधता है। इतनी तादाद में पक्षियों के स्थानांतरण की ओर हमारा ध्यान क्यों नहीं गया? बात दरअसल यह है कि अधिकांश पक्षी रात के समय ही प्रवासी उड़ान भरते हैं। अतः उनके बड़े-बड़े झुंडों की ओर हमारा ध्यान जाता ही नहीं है।

प्रकृति में यह देखा जाता है कि पक्षी अपने प्रवास क्षेत्रों में से जो क्षेत्र ऊंचे अक्षांश पर स्थित होते हैं, वहीं प्रजनन करते हैं। अतः जाड़ों में यहां आनेवाले पक्षी यहां घोंसला बनाते नहीं देखे जाते।

जिस प्रकार जाड़ों के शुरू होते ही असंख्य प्रवासी पक्षी हमारे यहां के झीलों में प्रकट होने लगते हैं, वैसे ही जाड़े के समाप्त होते ही वे वापिस भी जाने लगते हैं। वापिस जाते समय पहले नर चल पड़ते हैं, क्योंकि उन्हें ठंडे प्रदेशों में लौटकर प्रजनन करने के क्षेत्रों पर कब्जा करना होता है। उनके जाने के कुछ समय बाद मादाएं चल पड़ती हैं। सबके बाद में अवयस्क चल पड़ते हैं। जाड़ों में हमारे यहां जब ये पक्षी आने लगते हैं, तो यह क्रम उलट जाता है।

वैज्ञानिकों के लिए यह हमेशा से कौतूहल का विषय रहा है कि हजारों किलोमीटर की यात्रा करनेवाले पक्षी दिशा-निर्धारण कैसे करते होंगे। आधुनिक अध्ययनों से पता चला है कि जो पक्षी दिन के समय उड़ते हैं, वे सूर्य द्वारा पृथ्वी के साथ बनाए गए कोण से और जो पक्षी रात में उड़ते हैं, वे तारों की स्थिति से दिशा-निर्धारण करते हैं। दिशाज्ञान हेतु पक्षी पर्वत, नदी, वन, झील आदि की स्थिति का भी उपयोग करते हैं। परंतु घने बादलों के बीच से उड़ते समय पक्षियों को न तो आकाश ही दिखाई देता है न जमीन।

फिर भी पक्षी दिगभ्रमित नहीं होते। स्पष्ट ही उनकी बनावट में ऐसी कोई विशेषता है जो इन बाहरी चीजों की मदद के बिना भी दिशा-निर्धारण में सहायता करती हैं। इस विशेषता की वैज्ञानिकों को अभी भी ठीक-ठीक समझ नहीं है।

प्रवासी पक्षियों को प्रवास यात्रा आरंभ करने की प्रेरणा दिन के घटते अंतराल से मिलती है। यानी, जब दिन इतने छोटे हो जाते हैं कि पक्षियों को आहार खोजने के लिए पर्याप्त समय नहीं मिल पाता तो वे प्रवास यात्रा आरंभ करते हैं। प्रवासी पक्षियों के शरीर में समय आने पर कुछ विशेष प्रकार के होरमोन भी प्रकट होते हैं, जो उन्हें प्रवास यात्रा पर चल निकलने के लिए उकसाते हैं।

उड़ान भरना एक श्रम-साध्य क्रिया है जिसमें काफी ऊर्जा खर्च होती है। फिर भी प्रवासी पक्षी आकाश में बड़ी ऊंचाइयों पर बेफिक्री से उड़ते पाए जाते हैं। इतनी ऊंचाइयों पर आक्सीजन की मात्रा भू-तल पर आक्सीजन की मात्रा से कहीं कम होती है। पर्वतारोही जानते हैं कि एवरेस्ट जैसे ऊंचे पर्वतों का आरोहण अधिक ऊंचाइयों पर आक्सीजन की कमी के कारण बहुत मुश्किल हो जाता है। लेकिन कम आक्सीजन का शायद पक्षियों पर कोई असर नहीं होता। उदाहरण के लिए हंस 10,000 मीटर से भी अधिक ऊंचाई पर उड़कर नियमित रूप से हिमालय पर्वत शृंखला को पार करते हैं। इतनी ऊंचाई पर आक्सीजन की मात्रा भू-तल पर मौजूद आक्सीजन की मात्रा का 30 प्रतिशत ही होती है।

एक अन्य विवादास्पद पहलू प्रवासी पक्षियों की रफ्तार है। जमीन से हजारों मीटर की ऊंचाई पर उड़ रहे पक्षियों की रफ्तार का अनुमान लगाना अत्यंत कठिन है। यह रफ्तार वास्तव में इस ऊंचाई पर वायु की रफ्तार और पक्षी की निजी रफ्तार का जोड़ होता है। उसका ठीक-ठीक आकलन कर पाना अत्याधुनिक उपकरणों की सहायता के बिना असंभव है। फिर भी प्रवासी पक्षियों की रफ्तार का अंदाजा इससे मिल जाता है कि कई बार प्रवासी पक्षियों के झुंड 150 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से उड़ रहे हवाई जहाजों के आगे निकल जाते हैं।

सबसे लंबी दूरी तक और सबसे श्रमसाध्य प्रवास यात्रा पर आर्टिक कुररी निकलती है। वह उत्तरी ध्रुव से दक्षिणी ध्रुव हर साल जाती है। इस प्रकार वह प्रतिदिन 150-200 किलोमीटर की यात्रा करती हुई कुछ ही हफ्तों में 10,000 किलोमीटर की दूर तय करती है, यानी वह हर साल पृथ्वी की परिक्रमा करती है।

4 comments:

बी एस पाबला said...

जानकारियों से भरी एक बढ़िया पोस्ट

अर्शिया अली said...

Rochak jaankaaree.
{ Treasurer-S, T }

गिरिजेश राव said...

मैंने इस पूरी श्रृंखला को प्रिंट कर बेटी को देने का निश्चय किया है ताकि उसका ज्ञानवर्धन हो सके।

Arvind Mishra said...

कुछ उदाहरणों का न होना खटका

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