Saturday, August 1, 2009

हाथी के मल से कागज

केनिया के माइक बुगारा नामक उत्साही संरक्षणविद ने अफ्रीकी हाथी की दयनीय स्थिति के बारे में चेतना जगाने के लिए एक विलक्षण विधि अपनाई है - वे हाथियों के मल से कागज बनाते हैं।

हाथियों के पसंदीदा विहार स्थल माउंट केनिया नामक पर्वत की ढलानों में पले-बढ़े बुगारा जानते हैं कि हाथियों के मल में रेशे का अंश काफी अधिक होता है। उन्होंने उन किसानों से हाथी का मल प्राप्त किया जिनके खेतों में ये जानवर घुस आए थे, और कुछ प्रयोगों के बाद कागज बनाने की एक कारगर प्रक्रिया खोज निकाली।

यद्यपि उनके द्वारा बनाया गया कागज कुछ खुरदुरा होता है और दफ्तरों आदि में शायद ही उसका उपयोग हो सके, लेकिन बुगारा का कहना है कि वन्यजीवों के जो चित्र वे बनाते हैं, उनके लिए यह कागज उत्तम हैं। इन चित्रों को बेचकर वे जो पैसा बना पाते हैं, उसे हाथियों को बचाने की आवश्यकता के बारे में जागरूकता लाने में खर्च करते हैं।

अब केनिया की वन्यजीवन सेवा उन्हें मल उपलब्ध कराने लगी है। हाल ही में इस सेवा ने अपने पचासवें वर्षगांठ के लिए इस कागज पर निमंत्रण पत्र बनाने के लिए बुगारा से कहा तथा इस अवसर पर देश के राष्ट्रपति को बुगारा द्वारा हाथी के मल से बनाए गए कागज पर तैयार किया गया केनिया का मानचित्र भेंट किया।

हमारे यहां के हाथियों की हालत भी पतली है। पता नहीं वे इस पृथ्वी पर कितने और दिनों के मेहमान हैं। ऐसे में यदि उन्हें भी बुगारा जैसा कोई देशी समर्थक मिल सके, तो कुछ बात बन सकती है।

5 comments:

गिरिजेश राव said...

बचपन याद आ गया। हमलोग सड़क पर हाथी के मल की तुलना गत्ते के टेक्सचर एवं रंग से कर अनुमान लगाया करते थे कि गत्ता हाथी के मल को सुखा कर बनता होगा !:)

आदमी के गू से भी गैस चालित जनरेटर का प्रयोग मैंने गोरखपुर सुलभ शौचालय में बहुत पहले देखा था। पता नहीं सफल रहा या नहीं!

‘नज़र’ said...

बढ़िया जानकारी है!
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Happy Friendship Day!
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ग़ज़लों के खिलते गुलाब

अनुनाद सिंह said...

बहुत अच्छा!

किसी ने सत्य ही कहा है - "कोई भी चीज गन्दी या बेकार नहीं है, केवल वह सही जगह पर नहीं है।"

अर्चना तिवारी said...

आर्श्चय... जानकारी के लिए धन्यवाद

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन said...

हमें तो बचपन में यह बताया जाता था कि उत्तर-प्रदेश में (कम से कम रोहिलखंड में कुटीर उद्योग के तौर पर) कुछ किस्म का गत्ता बनाने में प्रयुक्त होता था. बाद में कभी गौर ही नहीं किया, आज आपका आलेख पढने के बाद याद आया.

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