Friday, July 10, 2009

बिजली की कहानी


जब किसी जोरदार तूफान के दौरान आकाश में पल-पल बिजली कड़क रही हो और कानों को सुन्न कर देनेवाला मेघ गर्जन हो रहा हो, तब हम एकाएक वायुमंडल में चल रही रहस्यमय एवं विध्वंसकारी प्राकृतिक घटनाओं के प्रति सचेत हो उठते हैं।

हर साल दुनिया भर में हजारों लोग बिजली गिरने से मरते हैं और बिजली के कारण लगी आगों से करोड़ों रुपए की संपत्ति नष्ट होती है। शायद इन्हीं सब कारणों से प्राचीन समय से ही बिजली ने मानव मन में भय और आदर का भाव जगाया है। भारत के मिथकों में वज्र (बिजली) को देवताओं का भयानक एवं अमोघ अस्त्र माना गया है। देवताओं के राजा इंद्र के हाथ में वज्र अनेक विकराल राक्षसों के वध का कारण बना है। जो पौराणिक कथाओं से परिचित हैं, वे जानते हैं कि वज्राघात का शिकार केवल राक्षस-दैत्य ही नहीं बने हैं। स्वयं हनुमान को बचपन में इसका सामना करना पड़ा था जब वे उगते सूरज को पका फल मानकर निगलने के लिए आगे बढ़े थे। हनुमान वज्राघात की निशानी आज तक लिए फिर रहे हैं (वे चिरंजीवी जो हैं!)। वज्र के कारण टूटे जबड़े के कारण ही उनका नाम हनुमान पड़ा है। मिथकों की बात छोड़ दें तो भी बिजली एक अत्यंत रोमांचकारी एवं उपयोगी चीज है।

वायुमंडल में मौजूद स्थिर वैद्युत के अचानक बह निकलने से बिजली प्रकट होती है। बिजली का स्फुलिंग बहुत लंबा, चमकीला और कई शाखाओं वाला होता है और वह दो विपरीत आवेशवाले स्थानों के बीच प्रकट होता है। स्फुलिंग की लंबाई कई किलोमीटर हो सकती है। तड़ित झंझा लानेवाले वर्षा-मेघों के कारण बिजली सर्वाधिक पैदा होती है। कई बार बिजली हिमपात, धूल की आंधियों और ज्वालामुखियों के विस्फोट के दौरान भी प्रकट होती है। एकदम साफ-सुथरे आकाश से भी बिजली प्रकट हुई है। तड़ित झंझाओं के दौरान बिजली एक ही बादल के भीतर या दो बादलों के बीच या बादल और जमीन के बीच या बादल और उसके चारों ओर की हवा के बीच प्रकट हो सकती है। अधिकांश स्फुलिंग एक ही बादल के विपरीत आवेशोंवाले हिस्सों के बीच प्रकट होते हैं, या पास-पास वाले दो बादलों के बीच।

किसी भी समय दुनियाभर में लगभग 2,000 तड़ित झंझाएं चल रही होती हैं। इनमें प्रति सेकेंड 100 से ज्यादा वैद्युतिक स्फुलिंग प्रकट होते रहते हैं। औसतन भारत के किसी भी भाग में साल में चार-पांच तड़ित झंझाएं प्रकट होती हैं। लेकिन तटवर्ती केरल और बंगाल में इस तरह के 50 से अधिक तूफान आते हैं। ये साधारणतः दुपहर के बाद आते हैं। मानसून पूर्व के महीनों में यानी अप्रैल-मई में भारत के अनेक भागों में तड़ित झंझाएं प्रकट होती हैं। पश्चिम बंगाल और असम में इस समय जो तूफान आते हैं, वे काफी उग्र स्वरूप के होते हैं। बंगाल में वे उत्तपूर्वी दिशा से आते हुए प्रतीत होते हैं और उन्हें काल बैसाखी कहा जाता है।

ये तड़ित झंझाएं सशक्त, ऊर्ध्वगामी, संवहनी हवाओं का उदाहरण हैं। उनके कारण बननेवाले वर्षा-मेघों का ऊपरी हिस्सा धनात्मक वैद्युतिक आवेशयुक्त होता है और निचला भाग ऋणात्मक वैद्युतिक आवेशयुक्त। भारत में ये बादल समुद्र-सतह से 16-17 किलोमीटर की ऊंचाई तक बन सकते हैं। इन बादलों के निचले हिस्से से नम वायु प्रवेश करती है और जैसे-जैसे वह बादल के अंदर से ऊपर उठती जाती है, इस हवा की नमी अलग होकर बादल में बदलती जाती है। इस प्रकार बादल के ऊपर से निकलने वाली वायु अपेक्षाकृत शुष्क होती है। इस प्राकृतिक चिमनी में से कई टन नम वायु का परिष्कार होता है।

जब इस तरह का वर्षा-मेघ कुछ 10 किलोमीटर की ऊंचाई तक बढ़ जाता है, तब उसमें वैद्युतिक प्रक्रियाएं शुरू हो जाती हैं। बादल के अंदर हवा का बहाव ऊपर की ओर और नीचे की ओर रहता है। बादल के ऊपरी हिस्से में तापमान शून्य से 40 डिग्री सेल्सियस नीचे होता है। इसलिए बर्फ कण स्वतः ही बन जाते हैं। बारिश की बूंदें भी खूब बड़ी-बड़ी बनती हैं क्योंकि बादल का आकार बहुत बड़ा होता है। वायु प्रवाह बारिश की इन बड़ी बूंदों को तोड़ देता है, जिससे उत्पन्न छोटी बूंदों में वैद्युतीय आवेश प्रकट हो जाता है। हवा के बहाव और विपरीत आवेशवाली बूंदों में परस्पर विकर्षण के सम्मिलित प्रभाव से ऋणात्मक और धनात्मक आवेशवाली बूंदें बादल के अलग-अलग हिस्सों में एकत्र हो जाती हैं। इससे बादल के विभिन्न हिस्सों में वैद्युतिक विभवांतर पैदा हो जाता है जो कई लाख वोल्ट का हो सकता है। जब यह विभवांतर एक सीमा से अधिक हो जाता है, तब बादल के विपरीत आवेशवाले हिस्सों के बीच आंखों को चौंधिया देनेवाली बिजली की चमक प्रकट होती है।

बादल के आधार से जमीन की ओर बढ़नेवाली धारा सबसे अधिक विध्वंसकारी होती है। वह एक अदृश्य, वैद्युत आवेशयुक्त वायु के रूप में शुरू होती है जो बादल से नीचे की ओर 50-50 मीटर के सोपानों में रुक-रुककर आगे बढ़ती है। जब वह जमीन से लगभग 100 मीटर की दूरी तक पहुंच चुकी होती है, तब जमीन की कोई ऊंची वस्तु, जैसे कोई पेड़ या इमारत से विपरीत आवेशवाली धारा ऊपर की ओर उठती है। दोनों धाराएं जमीन से 50 मीटर की ऊंचाई पर मिल जाती हैं। तब बादल में संचित सारी वैद्युत राशि जमीन को बह जाती है। इसके तुरंत बाद बिजली की एक चमकीली विपरीत धारा जमीन से बादल की ओर बह चलती है। इस पलट धारा के पीछे-पीछे एक सेकेंड से भी कम अंतरालों में अनेक छोटी धाराएं जमीन पर से बादल की ओर मुख्य धारा के ही पथ पर चल पड़ती हैं।

बिजली की एक साधारण चमक में बादल और जमीन के बीच कई करोड़ वोल्ट का विभवांतर पैदा हो जाता है। पलट धारा में 20,000 एंपियर जितना वैद्युत बह चलता है। इस वैद्युत धारा के बहने के पथ पर तापमान 30,000 डिग्री सेल्सियस तक बढ़ जाता है, यानी सूर्य की सतह से पांच गुना अधिक। इतनी गरमी के कारण उस पथ पर मौजूद हवा लगभग विस्फोटक गति से फैलती है, जिससे जो ध्वनि तरंगें उत्पन्न होती हैं, वे ही बादल का कर्णविदारी गर्जन होता है, जो बादल के नीचे की जमीन की आकृति के अनुरूप गूंज उठता है।

बिजली अनेक रहस्यमय रूपों में भी प्रकट होती है। इन सबके बारे में वैज्ञानिकों तक को ज्यादा जानकारी नहीं है। ऐसा एक रूप गोलाकार बिजली है। वह आवेशयुक्त गोल अग्नि-पिंड के रूप में प्रकट होती है जो चार-पांच सेकेंड से अधिक समय के लिए नहीं टिकती। जिन्होंने ऐसी बिजली देखी है, वे कहते हैं कि वह जमीन पर धीरे-धीरे लुढ़कती है और उसका धीरे-धीरे क्षय होता जाता है। कभी-कभी उसमें विस्फोट भी होता है।

सन 1749 में अमरीकी वैज्ञानिक बेंजमिन फ्रैंकलिन ने इमारतों को बिजली गिरने के नुक्सान से बचाने के लिए उनके सबसे ऊंचे हिस्से में धातु की एक नुकीली छड़ी लगाने का सुझाव दिया। इस छड़ी को तांबे के एक तार से जोड़कर तार के दूसरे सिरे को जमीन में गाड़ दिया जाता है। चूंकि बिजली आमतौर पर सबसे ऊंचे बिंदु पर ही आ लगती है, इमारत की ओर अग्रसर बिजली को यह छड़ी अपनी ओर आकर्षित कर लेती है, और तार के द्वारा बिजली का आवेश जमीन में उतर जाता है। इससे इमारत को नुकसान नहीं होता।

यद्यपि बिजली से काफी विध्वंस होता है, फिर भी उसके कुछ उपयोग भी हैं। पृथ्वी पर जीवन के बने रहने और उसके फलने-फूलने के लिए बिजली का होना अत्यंत आवश्यक है। बिजली के कारण जो आग लगती है, वह जमीन पर एकत्र हुए जैव-तत्व को पुनर्चक्रित करने के लिए बहुत आवश्यक है। जली वनस्पति की राख मिट्टी में मिलकर उसे उपजाऊ बनाती है। कुछ प्रकार के पेड़ों के बीज आग से झुलसने पर ही अंकुरित होने की स्थिति में आते हैं।

बिजली की एक चमक में इतनी ऊर्जा होती है कि वह हवा में मौजूद ऑक्सीजन और नाइट्रोजन को संयुक्त होने पर मजबूर कर देती है। इससे नाइट्रिक आक्साइड पैदा हो जाता है जो वर्षा जल में घुलकर नाइट्रिक अम्ल बनाता है। यह जमीन के पदार्थों से रासायनिक अभिक्रिया करके नाइट्रेट में बदल जाता है। इस नाइट्रेट को पौधे अपनी जड़ों की सहायता से अवशोषित कर लेते हैं। सभी पौधों के लिए नाइट्रेट आवश्यक है, पर बहुत कम प्रकार के पौधे उसे सीधे हवा से प्राप्त कर सकते हैं। बाकी सब को बिजली पर निर्भर करना पड़ता है।

इससे भी अधिक महत्वपूर्ण बात यह है कि स्वयं जीवन के उन्मीलन में बिजली की भूमिका रही हो सकती है। सन 1950 में हरोल्ड उरे नामक रसायनविद ने पृथ्वी के आदिम वायुमंडल में जो-जो गैसें मौजूद थीं, उन्हें एक कांच के पात्र में एकत्र करके उस पात्र में बिजली प्रवाहित करके चिंगारियां प्रकट करवाईं। इससे पात्र में अमीनो अम्ल पैदा हुआ, जो जीवित कोशिकाओं का अनिवार्य अंग होता है। इससे पता चलता है कि पृथ्वी पर जीवन सर्वप्रथम तब प्रकट हुआ होगा जब प्रागैतिहासिक वायुमंडल में बिजली चमक उठी होगी और इससे प्रथम जीवित कोशिका उत्पन्न हुई होगी।

6 comments:

संजय बेंगाणी said...

सुन्दर वैज्ञानिक जानकारी.
भविष्य में इस सम्बन्धी जानकारी चाहिए होगी तो कोई खोजता हुआ यहाँ जरूर आएगा.

क्या अब भी चिट्ठों से साहित्य न मानें? :)

संगीता पुरी said...

विशुद्ध वैज्ञानिक .. पर जनसामान्‍य के लिए सरल भाषा में लिखी गयी उपयोगी जानकारी .. आपका बहुत बहुत धन्‍यवाद !!

काजल कुमार Kajal Kumar said...

सुंदर जानकारी के लिए धन्यवाद.

anil said...

बहुत ही बढ़िया व ज्ञानवर्धक जानकारी ...!

अल्पना वर्मा said...

आप ने सरल शब्दों में बिजली की कहानी समझाई.ज्ञानवर्धक पोस्ट .
आप की 'मोर 'पोस्ट का गजरोला टाईम्स में ज़िक्र हुआ इस के लिए आप को बधाई.
' मेंढक की शादी' वाली आप की पोस्ट पर भी किसी समाचार पत्र की नज़र पड़नी चाहिये.क्योंकि वह अन्धविश्वास उन्मूलन के लिए किया जारहा सराहनीय प्रयास है.

Anonymous said...

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