Thursday, July 2, 2009

सूअर बुखार की चीरफाड़


विश्व स्वास्थ्य संगठन ने ए/ए1/एच1/ विषाणु के कारण होनेवाले सूअर बुखार (स्वाइन फ्लू) को सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए विश्वव्यापी महामारी (पैंडेमिक) के स्तर के जोखिम की संभावना वाली स्थिति माना है (देखिए चित्र)। यह बुखार मेक्सिको में सर्वप्रथम प्रकट हुआ था। अब तक वहां इस रोग के कारण 81 लोगों की मृत्यु हो चुकी है और 1,000 से अधिक लोगों को इसकी छूत लग चुकी है। अब अमरीका, कनाडा, यूके, भारत आदि अनेक देशों में इस रोग से पीड़ित रोगी देखे जा रहे हैं। भारत में दिल्ली, गोवा, कोयंबत्तूर, हैदराबाद आदि स्थानों में इसके मरीज मिले हैं। अब तक भारत में सूअर बुखार के मरीजों की संख्या 50 पार कर चुकी है।

विश्व स्वास्थ्य संगठन ने जून 17 तक विश्व भर में 89 देशों में 44,287 प्रयोगशाला में सिद्ध मरीजों के होने की सूचना दी है।



आनेवाले दिनों में इस रोग के और विकट रूप धारण करने की संभावना है। बुद्धिमानी इसी में है कि हममें से हर एक व्यक्ति इसके लक्षणों, फैलने के तरीकों और बचाव के उपायों के बारे में जानकारी रखे।

इस लेख में इस बीमारी के बारे में कुछ सामान्य जानकारी दी गई है।

1. क्या है सूअर बुखार?

यह सूअरों का श्वसन रोग है जो इन्फ्लुएन्सा लानेवाले टाइप ए विषाणुओं के कारण होता है। इसके कारण सूअरों में बड़ी तादाद में इन्फुलुएन्सा होता है, पर मृत्यु कम ही होती है। इस इन्फ्लुएन्सा के चार अलग-अलग प्रकार होते हैं। आजकल देखा जा रहा प्रकार एच1एन1 नामक विषाणु के कारण होता है। इसे ए/एच1/एन1 भी कहा जाता है।

2. यह रोग कैसे फैलता है?

सूअर बुखार लानेवाले विषाणु सामान्य स्थिति में मनुष्यों को छूत नहीं लगाते हैं, पर जो मनुष्य सूअरों के निकट संपर्क में रहते हैं, जैसे सूअर पालक, उनमें ये विषाणु कभी कभी रोग का कारण बनते हैं। एक बार यह रोग मनुष्य को लग जाए, तो वह रोगी दूसरे मनुष्यों को आसानी से छूत दे सकता है।

3. इस रोग के ल्क्षण क्या हैं?

इसके लक्षण फ्लू के लक्षणों के समान ही होते हैं, यानी, तेज बुखार, कमजोरी, खांसी, गले में खराश, और भूख न लगना। कुछ लोगों में उल्टी और दस्त भी होता है।

4. क्या इस तरह का फ्लू पहले कभी देखा गया है?

नहीं। फ्लू लानेवाले विषाणु में उत्परिवर्तन लगातार होता रहता है, और उसके नए-नए रूप प्रकट होते रहते हैं। सूअरों को मनुष्यों में फ्लू लानेवाले विषाणुओं, पक्षियों में फ्लू लानेवाले विषाणुओं और मनुष्यों में फ्लू लानेवाले विषाणुओं के कारण फ्लू हो सकता है। उनके शरीर में इन तीनों प्रकार के विषाणुओं के परस्पर मिलने से एक नए प्रकार का विषाणु प्रकट हुआ है जिसमें इन तीनों ही विषाणुओं के आनुवांशिक गुण विद्यमान हैं।

5. क्या सूअर बुखार का इलाज प्रति-विषाणु (ऐंटीवाइरल) दवाओं और टीके (वैक्सीन) से हो सकता है?

सूअर बुखार लानेवाले विषाणु में दो साधारण दवाओं के प्रति प्रतिरोधी क्षमता है – अमेन्टाडाइन (Amantadine) और रिमेन्टाडाइन (Rimantadine)। सूअर बुखार लानेवाले विषाणु मनुष्य में फ्लू लानेवाले विषाणुओं से काफी भिन्न हैं। इसलिए मानव फ्लू के इलाज के लिए जो टीके और दवाएं उपलब्ध हैं, उनका इन विषाणुओं पर ज्यादा असर नहीं पड़ता है। लेकिन एक टीका इस रोग के लिए प्रयोगशाला में विकसित किया जा चुका है और आवश्यकता पड़ने पर उसे व्यापक पैमाने पर उपलब्ध कराया जा सकता है।



6. क्या सूअर का मांस खाने से यह रोग हो सकता है?

नहीं। यह रोग भोजन के जरिए नहीं फैलता। वैसे भी यदि सूअर के मांस को 70 डिग्री से अधिक तापमान पर पकाया जाए, तो विषाणु मर जाते हैं।

7. इस रोग को इतनी गंभीरता से क्यों लिया जा रहा है?

हर साल इन्फ्लुएन्सा मानव आबादी के 5-10 प्रतिशत को प्रभावित करता है। अधिकांश मामले मामूली होते हैं, पर फिर भी हर साल 30 से 50 लाख लोगों में यह उग्र रूप धारण करता है, और लगभग 2.5 लाख से 5 लाख लोग दुनिया भर में हर साल इसके कारण मरते हैं।

इन वार्षिक मौतों के अलावा, 20वीं सदी में इनफ्लुएन्सा ने तीन बार विश्वव्यापी महामारी का रूप भी धारण किया था – 1918 का स्पेनी फ्लू जिसमें अंदाजतन 10 करोड़ लोग मरे, 1957 का एशियाई फ्लू जिसमें 2 करोड़ लोग मरे, और 1968 का हांगकांग फ्लू जिसमें 400 लोग मरे।

इसलिए सूअर बुखार के भी इस तरह का विकराल रूप धारण करने की संभावना है। अतः उसे फैलने से रोकने के लिए हर संभव प्रयास किया जाना चाहिए।


8. सूअर बुखार से बचे रहने और उसे फैलने से रोकने के लिए क्या करना चाहिए?
  1. खांसते-छींकते समय मुंह को कपड़े या टिशू पेपर से ढंका रखें, और बाद में उस कपड़े या टिशू पेपर को सही तरीके से निपटाएं।
  2. बीमार लोगों से जितनी कम हो सके उतनी कम संपर्क रखें। उदाहरण के लिए उनके स्वास्थ्य लाभ की कामना करने या उन्हें सांत्वना देने के लिए उन्हें मिलने जाने से बचें।
  3. नाक, मुंह और आंखों को हाथों से छूने की प्रवृत्ति को रोकें क्योंकि विषाणु सबसे पहले हाथों पर आता है, और दूषित हाथ से नाक, मूंह, आंख आदि को छूने से उन्हें शरीर के भीतरी भागों में फैलने का अवसर मिलता है।
  4. रोग के लक्षण प्रकट होने पर ठीक होने तक स्कूल, दफ्तर आदि न जाएं।
  5. बस, ट्रेन आदि की यात्रा से लौटने के बाद और कहीं भी बाहर जाकर आने के बाद हाथों को साबुन से अच्छी तरह धोएं।
  6. रोग के शुरुआती लक्षण प्रकट होते ही चिकित्सकीय सहायता लें।
  7. खांसते-छींकते रोगी से कम से कम छह मीटर की दूरी बनाए रखें।
  8. बहुत से व्यक्तियों द्वारा छुई जानेवाली वस्तुओं को क्लोरीन मिले पानी से बारबार साफ करें। इन वस्तुओं में शामिल हैं, फोन, दरवाजों के हत्थे, मेज की सतह, कंप्यूटर के कुंजीपटल, अलमारियों के हत्थे, दराज, आदि।
  9. रोगी रोग के लक्षणों के प्रकट होने के प्रथम पांच दिनों में ही दूसरों को यह बीमारी दे सकता है, यद्यपि छोटे बच्चे आठ-दस दिन तक भी दूसरों को छूत दे सकते हैं। इसलिए बीमार होने पर इतने दिन तक घर में ही रहें।

7 comments:

Udan Tashtari said...

आभार जानकारी का!

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...

बहुत ही सामयिक और उपयोगी जानकारी। इसे यहाँ उपलब्ध कराने के लिए आभार!

गिरिजेश राव said...

कमाल है। सारी जानकारी एक ही जगह! उत्तम

Arvind Mishra said...

प्रयाप्त जानकारी -शुक्रिया ! लोगबाग समझ लें काप्लेसेंसी से काम नहीं चलने वाला

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

जानकारी देने के लिए आभार।

राज भाटिय़ा said...

अजी उन रुपये के नोटो को का तो भुल हई गये जो गंदगी से भरे मिलते है, उन से केसे बचे?
वेसे आप ने जो जानकारी दी बहुत उम्दा, बहुत अच्छी है, धन्यवाद

Anonymous said...

very good information thank you

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