Friday, July 3, 2009

ऊर्जा संकट की कुंजी समुद्रों में ढूढ़ी जानी चाहिए

पृथ्वी के 71 प्रतिशत सतह को ढकनेवाले समुद्र सूर्य से आनेवाली अथाह ऊर्जा को निरंतर सोखते रहते हैं और वे हमारे लिए ऊर्जा का एक अजस्र स्रोत हो सकते हैं। इसलिए इसमें आश्चर्य ही क्या कि विश्व भर में समुद्र से ऊर्जा प्राप्त करने की विधियों की खोज में पैसा पानी की तरह बहाया जा रहा है।

भारत के लिए समुद्र से ऊर्जा प्राप्त करना इसलिए भी महत्व रखता है क्योंकि भारत के पास खनिज तेल और गैस के प्राकृतिक स्रोत बहुत सीमित हैं। इसकी तुलना में उसके पास एक लंबा समुद्र तट है। समुद्री ऊर्जा का मुख्य फायदा यह है कि वह ऊर्जा का एक ऐसा स्रोत है जो उपयोग से खत्म नहीं हो जाता और वह लगभग पूर्णतः प्रदूषण मुक्त है। दूसरी बात यह है कि समुद्री ऊर्जा भारत के उन दूर-दराज द्वीपों के लिए विशेष रूप से महत्वपूर्ण है जिन्हें राष्ट्रीय बिजली ग्रिड से जोड़ना संभव नहीं है।

समुद्र से ऊर्जा प्राप्त करने के अनेक तरीके हैं, जैसे लहरों से, ज्वार-भाटे से, समुद्र के विभिन्न स्तरों में मौजूद तापमान भेद से, समुद्र से जमीन की ओर बहनेवाली हवा से, समुद्री सतह के बहाव (ओशियन करंट्स) से और समुद्री वनस्पति से। इन सभी में से लहरों, ज्वार-भाटों और तापमान के अंतर से ऊर्जा प्राप्त करना आज तकनीकी दृष्टि से संभव है।

लहरों से ऊर्जा
समुद्र की सतह पर निरंतर चलती रहने वाली शक्तिशाली लहरों को देखकर कोई भी समझ सकता है कि यह ऊर्जा का एक ऐसा स्रोत है जो कभी न खत्म होनेवाला है। सूर्य से पृथ्वी की ओर आनेवाली कुल ऊर्जा का 1.5 प्रतिशत पवनों में बदल जाती है। पवन-ऊर्जा का एक अंश समुद्र की सतह को प्राप्त होता है और यही लहरों को जन्म देता है। लहरों से ऊर्जा प्राप्त करना पवन से ऊर्जा प्राप्त करने से अधिक अच्छा है क्योंकि समुद्र की सतह पवन की ऊर्जा को संचित करके पवन की ऊर्जा में समय और दिशा की दृष्टि से जो अनिश्चितताएं होती हैं, उन्हें काफी हद तक दूर कर देती है।

किसी जगह पर समुद्री लहरों से कितनी ऊर्जा प्राप्त की जा सकती है, यह उस जगह की भौगोलिक स्थिति पर तो निर्भर होता ही है, वह मौसम, दिन के समय आदि पर भी निर्भर करता है। भारत के तटों पर लहरों की वार्षिक औसत ऊंचाई 1.5 मीटर और दो लहरों के बीच का समयांतराल लगभग 6 सेकेंड होता है। कई जगहों पर यह सब औसत से कहीं अधिक भी होता है। उदाहरण के लिए पूर्वी तट पर काकीनाडा के पास कलपक्कम नामक स्थान से एकत्र किए गए आंकड़ों से पता चलता है कि वहां वर्षाकाल के सिवा अन्य महीनों में भी लहरों की ऊंचाई 2.5-3 मीटर हो सकती है। इससे पता चलता है कि भारत के 6,000 किलोमीटर लंबे तटों पर से 60,000 मेगावाट जितनी बिजली बनाना संभाव है।

मद्रास के भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान ने भारत सरकार के समुद्री विकास विभाग की सहायता से 1983 में समुद्र की लहरों से ऊर्जा प्राप्त करने के लिए एक परियोजना शुरू की थी। 1991 को केरल में विषिंजम नामक स्थल पर पानी के कंपन करनेवाले स्तंभ (ओसिलेटिंग वाटर कोलम) के सिद्धांत पर आधारित एक बिजलीघर का प्रारूप स्थापित किया गया था। इसकी क्षमता 150 किलोवाट है और इसे राष्ट्रीय परीक्षण स्थल घोषित किया गया है। इससे अधिक सुधरा हुआ हवा से चलनेवाला टरबाइन और वेरिएबल स्पीड इंडक्शन जनित्र भी विकसित किए गए हैं। परियोजना के अगले चरण में केरल के तंगनाश्शेरी बंदरगाह के पास 110 किलोवाट क्षमतावली 15 इकाइयां स्थापित की जाएंगी। इन्हें लहरों को तोड़ने के लिए बनाई गई संरचना में फिट किया जाएगा।

ज्वार-भाटे से ऊर्जा
भारत में ऐसे अनेक स्थल हैं जो ज्वार-भाटे से ऊर्जा प्राप्त करने के लिए उपयुक्त हैं। कच्छ की खाड़ी और खंभात की खाड़ी में ज्वार और भाटे के दौरान जलस्तर की ऊंचाई का अंतर सबसे अधिक है। यह लगभग 11 मीटर है। औसत वार्षिक अंतर 6 मीटर के आस पास है। पश्चिम बंगल के सुंदरबन इलाके में ज्वार-भाटे का वार्षिक अंतर 3.5 मीटर है। 1975 में संयुक्त राष्ट्र संघ के एक विशेषज्ञ द्वारा किए गए सर्वेक्षण से पता चला कि खंभात और कच्छ की खाड़ियों में एक बहुत बड़ा बिजलीघर लगाया जा सकता है। सुंदरबन में अपेक्षाकृत छोटे बिजलीघर लग सकते हैं। उसके अनुसार खंभात की खाड़ी, कच्छ की खाड़ी और सुंदरबन में क्रमशः 7300 मेगावाट, 1000 मेगावाट और 15 मेगावाट क्षमता के संयंत्र लगाना संभव होगा। इनकी लागत क्रमशः 1925 करोड़ रुपए, 600 करोड़ रुपए और 15 करोड़ रुपए होगी। खंभात की खाड़ी में 40 मीटर ऊंची और 30 किलोमीटर लंबी एक दीवार की भी जरूरत पड़ेगी।

राष्ट्रीय समुद्री प्रौद्योगिकी संस्थान और मद्रास के भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान ने अभी हाल ही में सुंदरबन में दुर्गादुवानी समुद्रमुख में एक लघु संयंत्र लगाने की संभावना का अध्ययन किया था। समुद्रमुख में ज्वार और भाटे के दौरान जलस्तर का औसत अंतर 2.5-5.4 मीटर है। कंप्यूटर माडलों की सहायता से पता लगाया गया है कि इस स्थान की वार्षिक ऊर्जा उत्पादन क्षमता 55 लाख किलोवाट-घंटा है। इसके लिए 0.5 मेगावाट क्षमता वाली 6 इकाइयों की आवश्यकता रहेगी। चूंकि यह स्थल दूर-दराज है और देश के बिजली ग्रिड से अलग-थलग है, इसलिए टरबाइन के साथ एक स्टैंड अलोन एसी सिन्क्रोनस जनित्र भी लगाना पड़ेगा।

ज्वार-भाटे के चक्र की औसत अवधि 12.5 घंटा होती है, लेकिन प्रत्येक चक्र के दौरान 3.5-5.5 घंटे तक ही बिजली का उत्पादन हो सकेगा। इससे दिन में 6-12 घंटे तक ही बिजली मिल सकेगी और निरंतर बिजली प्राप्त करना संभव न होगा। यदि एक 0.5 मेगावाट का डीजल जनित्र को भी बिजलीघर के साथ समांतर में जोड़ दिया जाए तो दुर्गादुवानी इलाके में अनवरत बिजली सप्लाई की जा सकेगी। दुर्गादुवानी में बिजली बनाने का खर्चा रु 3.43/किलोवाट-घंटा आंकी गई है।

ओटीसीई से बिजली उत्पादन
समुद्र की सतह के तापमान और 10-20 मीटर की गहराई पर पानी के तापमान में काफी अंतर होता है। इस अंतर से बिजली पैदा की जा सकती है। इस विधि को ओटीसीई (ओशियन थर्मल कन्वर्षन इक्विवलेंट) पद्धति कहा जाता है। बंबई से विशाखापट्टनम तक भारत के 3,000 किलोमीटर लंबे तटों पर साल भर समुद्र की ऊपरी और निचली सतह के तापमान में 20 अंश सेल्सियस का अंतर रहता है। इस प्रकार भारत के एकाधिकार में आने वाले 3 लाख वर्ग किलोमीटर समुद्री क्षेत्र में साल भर ऊर्जा उत्पादन के लिए आवश्यक तापांतर मौजूद है। इसके अलावा लक्षद्वीप और अंदमान-निकोबार द्वीपों के पास भी ओटीसीई की दृष्टि से महत्वपूर्ण स्थल हैं। भारत में ओटीसीई पद्धति से 50,000 मेगावाट बिजली पैदा की जा सकती है, जो इस समय भारत में बन रही कुल बिजली का 15 प्रतिशत है।

1980 से ओटीसीई से बिजली उत्पादन पर चैन्नै स्थित भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान में विशेषज्ञों का एक गुट कार्य कर रहा है। इस गुट द्वारा तमिल नाड के कुलशेखरपुरम में लगाने के लिए विकसित 1 मेगावाट की इकाई तरल अमोनिया से काम करेगी। तमिलनाड की सरकार ने सी सोलर कोरपरेशन नामक अमरीकी कंपनी से तमिलनाड के तटों पर से ओटीसीई पद्धति से 100 मेगावाट बिजली बनाने के लिए एक अनुबंध किया है।

माना जाता है कि अगले 50 सालों में प्राकृतिक तेल के भौगोलिक भंडार चुक जाएंगे। ऊर्जा के अन्य स्रोत, जैसे कोयला या नाभिकीय ऊर्जा, अनेक प्रकार की पर्यावरणीय समस्याओं से ग्रस्त हैं। ऐसे में उभरती ऊर्जा संकट से पार पाने के लिए हमें समुद्र, सूर्य, पवन आदि नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों की ओर मुड़ना होगा। यदि समुद्री ऊर्जा प्रौद्योगिकी में अनुसंधान जारी रखा गया और उसमें पर्याप्त पूंजी लगाई गई तो भविष्य में भारत अपनी ऊर्जा आवश्यकता के एक बहुत बड़े भाग को उसके चारों ओर के समुद्रों से प्राप्त कर सकेगा।

10 comments:

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...

बहुत बहुत उपयोगी जानकारी से भरपूर आलेख।

Science Bloggers Association said...

बहुत ही सही सलाह है आपकी। अब सरकार को इसपर विशेष ध्यान देना चाहिए।
-Zakir Ali ‘Rajnish’
{ Secretary-TSALIIM & SBAI }

संगीता पुरी said...

बहुत अच्‍छा आलेख .. सही सलाह है आपकी !!

राज भाटिय़ा said...

बहुत सुंदर जानकारी दी आप ने, वेसे हमारे यहा पढेलिखे, ओर विग्यानिको ओर काबिल लोगो की कमी नही है, ओर इन महत्व पुर्ण स्रोतओ ओर प्राकृतिक उर्जा की भी कमी नही, कमी है तो देश प्रेम की, इमान दारी की, जब राजा ही चोर होगा तो प्रजा क्या करेगे, सब से पहले हमारे नेता, अफ़सर इमान दार हो, ओर यही हम मार खा रहे है.
धन्यवाद

बालसुब्रमण्यम said...

राज भाटिया जी, मैं आपके विचारों से बिलकुल सहमत हूं। यही हमारी सबसे बड़ी कमी है - देश भक्ति की। यदि सब लोग देश हित की सोचने-करने लग जाएं, तो सब समस्याओं का हल मिल सकता है। पर ऐसा हो कैसे, यही बड़ा सवाल है। इस पर अपने विचार अपने ब्लोग आदि में अवश्य व्यक्त करें।

cartoonist anurag said...

bahut hi gyan vardhak jankaree....
badhai....

गिरिजेश राव said...

बालसुब्रमण्यम जी,यहाँ अप्रासंगिक लेकिन देशहित और भ्रष्टाचार बहुत ही संवेदनशील मुद्दे हैं। कहते हैं जापान जैसे देश में भी उच्च स्तर पर बहुत भ्रष्टाचार है। लेकिन काम की गुणवत्ता और गति के मामले में कोई समझौता नहीं होता।

अपने यहाँ ऐसा क्यों नहीं है?

भारतीय नागरिक - Indian Citizen said...

बालाजी या बाला साहब, आपने बहुत उत्तम जानकारी दी है. लेकिन यहां के नेताओं के ठस दिमाग इन अच्छे कामों में नहीं लगते.

बालसुब्रमण्यम said...

गिरिजेश जी: भ्रष्टाचार का मुद्दा यहां के लिए अप्रासंगित है, पर उस पर चर्चा जरूरी है।

आपने जापान के भ्रष्टाचार का जिक्र किया है। जापान जैसे समृद्ध देशों के भ्रष्टाचार और भारत के भ्रष्टाचार में जो रोचक अंतर है, उसके बारे में मैंने किसी चोटी के अर्थशास्त्री की किताब में पढ़ा था (शायद वह अमर्त्य सेन ही थे और किताब थी, द आर्ग्युमेंटेटिव इंडियन, किताब बहुत अच्छी है, और आपको भी पढ़नी चाहिए)।

उनका कहना है, भारत में तो भ्रष्टाचार में भी भ्रष्टाचार होता है। अर्थात जापान का कोई आला अफसर या मंत्री किसी बात के लिए रिश्वत लेता है, तो वह ईमानदारी से वह काम कर देता है। पर भारत में मंत्रीगण और अफसर पैसा भी गटक जाते हैं, और जिस काम के लिए पैसा लिया था, वह काम भी नहीं करते!

अल्पना वर्मा said...

bahut hi shodh pooran lekh hai.
asha hai is or scientists ka dhyan jayega.

In UAE now they are working on to get renewable energy from Sun light and wind.

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