Friday, July 17, 2009

अंटार्क्टिका -- दुनिया का सबसे ठंडा महाद्वीप

सातों महाद्वीपों में से सबसे ठंडा महाद्वीप अंटार्क्टिका महाद्वीप है। वह सबसे दुर्गम तथा मानव-बस्तियों से सबसे दूर स्थित जगह भी है। वह साल के लगभग सभी महीनों में दुनिया के सबसे अधिक तूफानी समुद्रों और बर्फ के बड़े-बड़े तैरते पहाड़ों से घिरा रहता है। उसका कुल क्षेत्रफल 1.4 करोड़ वर्ग किलोमीटर है। क्षेत्रफल की दृष्टि से वह आस्ट्रेलिया से बड़ा है। अंटार्क्टिका में बहुत कम बारिश होती है, इसलिए उसे ठंडा रेगिस्तान माना जाता है। वहां की औसत वार्षिक वृष्टि मात्र 200 मिलीमीटर है।

सन 1774 में अंग्रेज अन्वेषक जेम्स कुक अंटार्क्टिक वृत्त के दक्षिण में किसी भूभाग की खोज में निकल पड़ा। उसे बर्फ की एक विशाल दीवार मिली। उसने अनुमान लगाया कि इस दीवार के आगे जमीन होगी। उसका अनुमान सही था, वह अंटार्क्टिक की दहलीज तक पहुंच गया था। पर स्वयं अंटार्क्टिका पर पैर रखने के लिए मनुष्य को 75 साल और लगे।

आर्क्टिक (उत्तरी ध्रुव) और अंटार्क्टिका (दक्षिणी ध्रुव) में काफी अंतर है। सबसे महत्वपूर्ण अंतर यह है कि अंटार्क्टिका में आर्क्टिक से छह गुणा अधिक बर्फ है। यह इसलिए क्योंकि अंटार्क्टिका एक महाद्वीप है, जबकि आर्क्टिक क्षेत्र मुख्यतः एक महासागर है। अंटार्क्टिका की बर्फ की औसत मोटाई 1.6 किलोमीटर है। अंटार्क्टिका महाद्वीप का अधिकांश भाग पर्वतों के उभरे हुए कंधों और चोटियों से बना हुआ है।

अंटार्क्टिका का मौसम बिरले ही पाले और बर्फीली हवाओं से मुक्त रहता है। इस महाद्वीप में शायद मात्र 2,000 वर्ग किलोमीटर खुली जमीन है। साल में केवल 20 ही दिन तापमान शून्य से ऊपर रहता है। पृथ्वी की सतह पर मापा गया सबसे कम तापमान भी अंटार्क्टिका में ही मापा गया है। सोवियत रूस द्वारा स्थापित वोस्टोक नामक शोधशाला में 24 अगस्त 1960 को तापमान -88.3 डिग्री सेल्सियस मापा गया।

अंटार्क्टिका के बारे में सही ही कहा गया है कि वह पवनों की राजधानी है। कभी-कभी 320 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार वाली हवाएं चल पड़ती हैं, जो जमीन से मिट्टी के कणों को काट कर उड़ा ले जाती हैं।

पूरे अंटार्क्टिका महाद्वीप में मात्र 70 प्रकार की जीवधारियां खोजी गई हैं। इनमें से 44 कीड़े-मकोड़े हैं। सबसे बड़ा कीड़ा एक प्रकार का पंखहीन मच्छर है। जोंख, खटमल, मक्खी, जुए आदि भी वहां काफी संख्या में पाए जाते हैं। अंटार्क्टिका में कोई स्थलीय स्तनधारी प्राणी नहीं है, पर बहुत से समुद्री स्तनधारी उसके तटों पर विश्राम करने आते हैं, या उसके आसपास के समुद्रों में आहार खोजते हैं। इनमें शामिल हैं कई प्रकार की ह्वेलें और दक्षिणी ध्रुव के आसपास रहनेवाले पांच प्रकार के सील -- केकड़ाभोजी सील, तेंदुआ सील, रोस सील, वेडेल सील और गजसील। रोस सील अत्यंत दुर्लभ प्राणी है, जबकि वेडेल सील तटों के नजदीक ही रहता है। सभी सीलों में बड़ा गजसील है। वह प्रजनन तो अंटार्क्टिका के निकट के द्वीपों में करता है, लेकिन अंटार्क्टिका के आसपास भोजन की तलाश करने आता है। अंटार्क्टिका के पास के समुद्रों में बिना दांतवाली ह्वेलें काफी मात्रा में पाई जाती हैं। उन्हें एक समय मांस, चर्बी आदि के लिए बड़े पैमाने पर मारा जाता था। आज उनके शिकार पर अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंध लगा हुआ है। अंटार्क्टिका में पाए जानेवाले पक्षियों में शामिल हैं दक्षिण ध्रुवीय स्कुआ तथा अडेली और सम्राट पेंग्विन।

अंटार्क्टिका में शाकाहारी प्राणी अत्यंत दुर्लभ हैं, कारण कि वनस्पति के नाम पर वहां शैवाक (लाइकेन), काई आदि आदिम पौधों की कुछ जातियां और केवल दो प्रकार के फूलधारी पौधे ही हैं।

अंटार्क्टिका इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि वहां अनेक प्रकार के वैज्ञानिक प्रयोग किए जा सकते हैं। वैज्ञानिकों ने वहां पृथ्वी की चुंबकीय विशेषताओं, मौसम, सागरीय हलचलों, जीवों पर सौर विकिरण के प्रभाव तथा भूगर्भविज्ञान से संबंधित अनेक प्रयोग किए हैं।

भारत सहित अनेक देशों ने अंटार्क्टिका में स्थायी वैज्ञानिक केंद्र स्थापित किए हैं। इन देशों में शामिल हैं चीन, ब्राजील, आर्जेन्टीना, कोरिया, पेरू, पोलेंड, उरूग्वे, इटली, स्वीडेन, अमरीका, रूस आदि।

भारत द्वारा स्थापित प्रथम पड़ाव का नाम था दक्षिण गंगोत्री। जब यह पड़ाव पानी के नीचे आ गया, तो मैत्री नामक दूसरा पड़ाव 1980 के दशक में स्थापित किया गया।

सदियों से अंटार्क्टिका प्रदूषण के खतरे से मुक्त था, पर अभी हाल में वैज्ञानिकों ने वहां की बर्फ में भी डीडीटी, प्लास्टिक, कागज आदि कचरे खोज निकाले हैं, जो वहां स्थापित वैज्ञानिक शिविरों से पैदा हुए हैं।

वैज्ञानिकों का मानना है कि अंटार्क्टिका में 900 से भी अधिक पदार्थों की महत्वपूर्ण खानें हैं। इनमें शामिल हैं सीसा, तांबा और युरेनियम।

अंटार्क्टिका पर अभी किसी देश का दावा नहीं है, न ही विभिन्न देशों के कुछ वैज्ञानिक शिविरों के सिवा वहां कोई मानव बस्तियां ही हैं। पर क्या यह स्थिति हमेशा ऐसी बनी रह पाएगी? जैसे-जैसे मानव आबादी बढ़ती जाएगी, अमरीका, अफ्रीका, आस्ट्रेलिया आदि महाद्वीपों के समान इसके उपनिवेशीकरण के लिए भी होड़ मच सकती है। यदि वहां किसी महत्वपूर्ण खनिज (जैसे, सोना, पेट्रोलियम, आदि) की बड़ी खानों का पता चले, तो भी उन पर अधिकार जमाने के लिए अनेक देश आगे आएंगे। पृथ्वी के गरमाने से अंटार्क्टिका की काफी बर्फ पिघल सकती है, जिससे वहां काफी क्षेत्र बर्फ से मुक्त हो सकता है और मनुष्य के रहने लायक बन सकता है। इससे भी अंटार्क्टिका में मनुष्यों का आना-जाना और बसना बढ़ सकता है। पर्यटन भी इसमें योगदान कर सकता है। जैसे-जैसे प्रौद्योगिकीय विकास होगा, ऐसे उपकरण उपबल्ध होने लगेंगे जो अंटार्क्टिका जैसे अत्यंत ठंडवाले इलाकों में भी सामान्य जीवन बिताने को सुगम बनाए।

इसलिए 17वीं 18वीं सदी में श्वेत जातियों द्वारा अफ्रीका, द. अमरीका आदि में जो लूट-खसोट और विनाश लीला मचाई थी, उससे इस अनोखे परिवेश को बचाने और इस महाद्वीप के अधिक संतुलित और समस्त मानव-जाति के हित में उपयोग को बढ़ावा देने के लिए 1959 में 12 देशों ने अंटार्क्टिका संधि में हस्ताक्षर करके इस महाद्वीप को सैनिक गतिविधियों और खनन से मुक्त रखने का निर्णय लिया। अब इस संधि में 46 देशों ने हस्ताक्षर कर दिए हैं, जिसमें भारत भी शामिल है।

2 comments:

काजल कुमार Kajal Kumar said...

सुनकर अच्छा लगता है कि अंटार्क्टिका अभी भी किसी देश विषेश का नहीं हैं।

Anonymous said...

Sir, u have given the relevant information on ' ANTARTICA'.
Prabhat, http://www.mynature-myfuture.blogspot.com .

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