Tuesday, May 26, 2009

सौम्य स्वभाव की समुद्री गाय



मध्य युग के मल्लाहों में मत्स्य कन्याओं की किंवदंतियां अत्यंत प्रचलित रही हैं। वे मानते थे कि ये मत्स्य कन्याएं मल्लाहों को लुभाकर उनके जहाजों को जलमग्न चट्टानों में भटका देती थीं। संभव है कि इस प्राचीन विश्वास के मूल में एक निरापद और भारी-भरकम समुद्री स्तनधारी जीव, यानी समुद्री गाय रही हो।

समुद्री गाय (अंग्रेजी में इसे डुगोंग कहते हैं) हाथियों के दूर का रिश्तेदार है, यद्यपि बाहरी बनावट में वह सीलों और जलसिंहों से मिलती-जुलती होती है। हाथियों के समान उसके भी अस्ति-पंजर वृहदाकार होता है और ऊपरी कृंतक दंत लंबे और नीचे की ओर बढ़े हुए होते हैं। नरों में ये दंत ऊपरी जबड़े से काफी बाहर निकले रहते हैं। समुद्री गाय का वजन १४०-२०० किलोग्राम होता है और लंबाई २.५-३ मीटर। शरीर का बड़ा आकार शारीरिक ऊष्मा को बचाए रखने में मदद करता है। उनके शरीर में चर्बी की मोटी परत होती है जो ठंडे समुद्रों में उनके शरीर को गरम रखती है। शरीर की आकृति लंबोतर और गोलाकार होती है जिससे उन्हें तैरने में आसानी रहती है। उनकी पीठ एवं बगल सलेटी रंग की होती हैं जबकि निचला भाग हल्के रंग का होता है। पूंछ ह्वेलों की पूंछ के समान चपटी होती है। इसे ऊपर-नीचे फटककर समुद्री गाय आगे बढ़ती है, न कि मछलियों के समान दाएं-बाएं झटककर। उनके हाथ-पैर भी चपटे और चप्पूनुमा होते हैं। तैरते समय इन अवयवों को शरीर से लगाकर रखा जाता है ताकि ये कम-से-कम अवरोध उत्पन्न करें।

आंखें छोटी, गोलाकार एवं काली होती हैं जो चौड़े एवं सख्त बालोंवाले थूथन के दोनों ओर स्थित होती हैं। बाहरी कान नहीं होते, केवल दो छोटे-छोटे सूराख होते हैं। नथुने बड़े एवं अर्द्ध चंद्राकार होते हैं। इन्हें बंद करने की विशेष व्यवस्था होती है। ऊपरी होंठ घुड़नाल की आकृति के एक मांसल अवयव में समाप्त होता है जो मुंह के आगे तक बढ़ा होता है। समुद्री गाय की दंत-व्यवस्था भी हाथियों की दंत-व्यवस्था के समान होती है, यानी वयस्क प्राणी में एक समय में केवल दो-तीन दाढ़ें ही होती हैं। जब ये घिस या गिर जाती हैं तो इनके ठीक पीछे नई दाढ़ें उगने लगती हैं।

भारतीय समुद्रों में समुद्री गाय की सबसे बड़ी बस्तियां मन्नार की खाड़ी में होती हैं। उन्हें कच्छ की खाड़ी, अंदमान द्वीप समूह तथा मलबार तट के समुद्रों में भी देखा गया है। वैसे वे प्रशांत महासागर के उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में भी पाई जाती हैं। मडागास्कर से लेकर आस्ट्रेलिया के उत्तर-पूर्वी तटों तक तथा फारस की खाड़ी में भी समुद्री गाय दिखाई देती है।

इन जीवों का नामकरण उनकी आदतों और स्वभाव को देखते हुए अत्यंत सार्थक है। गाय-भैंसों के ही समान वे भी पूर्णतः शाकाहारी हैं और समुद्री घास पर निर्भर हैं। मेनाटी नामक एक अन्य समुद्री स्तनी और समुद्री गाय, ये ही दो समुद्री स्तनी हैं जो पूर्णतः शाकाहारी होते हैं। मेनाटी समुद्री गाय का निकट संबंधी है। समुद्री गाय अपने मांसल होंठों से समुद्री घास को उखाड़ती है, उसे पानी में अच्छी तरह झाड़ती है ताकि उसके साथ रेत कण न लगे रह जाएं जो उसके दांतों को नुक्सान कर सकते हैं, और फिर उसे चबाकर निगल जाती है। यह समुद्री घास छिछले उष्णकटिबंधीय सागरों और तटों के पास उगती है। घोड़ों और हाथियों के समान समुद्री गाय जुगाली न करनेवाला शाकाहारी प्राणी है। वे अपने आगे के पैरों से कंद-मूल को भी खोदकर खाती हैं। समुद्री गायों को पानी से ऊपर उठ आकर तट किनारे के पेड़ों की निचली डालियों से पत्ते आदि तोड़कर खाते भी देखा गया है।

समुद्री गाय अत्यंत सौम्य स्वभाव का प्राणी है। सामान्यतः वे गहरे पानी में सतह से थोड़ा नीचे तैरती रहती हैं, जहां उन्हें धूप की गरमी भी लगती रहती है। रह-रहकर वे सांस लेने ऊपर आती जाती हैं। शाम के वक्त वे छिछले पानी की ओर चली आती हैं। ज्वार-भाटे के समय वे सागर तट में आकर पीछे लौटे जल द्वारा अनावृत्त जल पौधों को चरने लगती हैं। समुद्री गाय बिरले ही जमीन पर आती हैं क्योंकि तेज धूप से उनकी मुलायम त्वचा झुलस जाती है। जमीन में उन्हें सांस लेने में भी तकलीफ होती है क्योंकि उनकी पसलियां कमजोर होती हैं और पानी के दबाव के अभाव में वे अंदर की ओर बैठने लगती हैं।

समुद्री गाय समूहचारी प्राणी है। नर और मादा उम्र भर के लिए नहीं तो कम-से-कम प्रजनन काल की पूर्ण अवधि के लिए साथ रहते हैं। मादा ५० साल के अपने जीवनकाल में केवल पांच या छह बच्चों को जनम देती है।

एक बार में केवल एक बच्चा पैदा होता है। बच्चे पानी के किनारे किसी रेतीले भाग में दिए जाते हैं। यह स्थान तट से थोड़ी ही दूरी पर होता है। नवजात शिशु अपनी मां के पीछे-पीछे हो लेता है और पानी में उतर जाता है। मां अपने शिशु को दो साल तक दूध पिलाकर बड़ा करती है। इस सारे समय मां और बच्चे के बीच अत्यंत निकट का संपर्क बना रहता है। दूध पिलाते समय मां बच्चे को अपने चप्पूनुमा हाथों से छाती से लगाकर पकड़ती है।

समुद्री गाय अत्यंत शर्मीले प्राणी होते हैं और हल्की-से-हल्की ध्वनि से भी बिदक जाते हैं। अतः उनकी आदतों और व्यवहारों के बारे में बहुत कम जानकारी उपलब्ध है। अन्य प्राणियों के विपरीत उनके जीवन में हिंसा का बहुत कम स्थान है। न तो उनके कोई परभक्षी शत्रु हैं, न ही वे स्वयं किसी प्राणी का शिकार करती हैं। हां उनके शिशुओं को मगरमच्छ अथवा शार्क मछली कभी-कभार पकड़ लेते हैं। जीवन को सफल बनाने के लिए उनके पास तीन ही उपाय हैं:- अत्यंत विकसित सुनने की शक्ति का उपयोग करते हुए खतरे से पहले ही अवगत हो जाना; अपने बड़े आकार, सख्त चमड़ी एवं मजबूत अस्ति-पंजर का फायदा उठाना--बड़े आकार के कारण बहुत कम प्राणी उन पर आक्रमण करने का साहस जुटा पाते हैं; तथा बहुत जल्द जमनेवाले खून का लाभ उठाना जिससे उनके घाव बहुत जल्द भर जाते हैं।

इन शांतिप्रिय प्राणियों को मनुष्यों से ही सबसे बड़ा खतरा है। तटीय इलाक़ों के लोग उन्हें मांस, चर्बी और दांत के लिए मारते हैं। अब समुद्र प्रदूषण, पर्यटन एवं शक्तिशाली मोटर नौकाओं से भी उन्हें खतरा पैदा हो गया है। इन नौकाओं से भिड़ने से अनेक समुद्री गाएं घायल हुई हैं।

इस निरापद प्राणी को संकटग्रस्त प्राणियों की सूची में रखा गया है। उसकी नस्ल को बचाने के लिए उसके आवास-स्थलों को अधिक संरक्षण प्रदान करना होगा। अन्यथा मत्स्य कन्याओं की मनमोहक किंवदंती की प्रेरणा बननेवाली समुद्री गाय स्वयं एक किंवदंती बनकर रह जाएगी।

2 comments:

गिरिजेश राव said...

मनुष्य ने अपने साथ दूसरे जीवों को भी संकट में डाल दिया है।

कहीं ऐसा तो नहीं कि यह बहुत ही धीमी चलने वाली विकास प्रक्रिया का सामान्य सा चरण हो !

काजल कुमार Kajal Kumar said...

इतनी सुंदर जानकारी के लिए धन्यवाद.

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