Wednesday, June 3, 2009

थिमक्का ने गोद लिए बरगद के पेड़

निस्संतान दंपति बच्चे गोद लेते हैं। पर कर्णाटक की रहनेवाली थिमक्का ने बरगद के पेड़ गोद लिए। वह भी एक-दो नहीं पूरे दो सौ चौरासी।

यह आज से पचास साल पहले की बात है। थिमक्का और उसके पति बिक्कालू के कोई बच्चे नहीं थे।

उन पर सब ताने कसते। आखिर तंग आकर थिमक्का ने सोचा, क्यों न बरगद के पेड़ लगाऊं, उन्हें अपने बच्चों की तरह पालूं? बिक्कालू को भी बात पसंद आ आई। बस, लग गए दोनों पति-पत्नी बरगद उगाने। सालों तक उन्होंने इन वृक्ष-संतानों को अपने हाथों से पानी-खाद दिया। उनको जानवरों से बचाया। धीरे-धीरे उनका प्यार रंग लाने लगा।

आज ये पेड़ सूखी, धूल-भरी सड़कों को हरा-भरा कर रहे हैं। हजारों चिड़ियों ने उनमें घोंसले बनाए हैं। पेड़ों की कीमत पच्चासी करोड़ रुपए हो गई है। पर उनका असली मूल्य तो थिमक्का ही जानती है। वह कहती है. "इन पेड़ों ने मेरी सूनी गोद भर दी है। उनकी मैं क्या कीमत लगाऊं? कोई अपने बच्चों की कीमत लगाता है भला?"

Tuesday, June 2, 2009

गेंद की तरह लुढ़क सकता है वज्रशल्क


वज्रशल्क हिमालय के दक्षिणी भाग, श्रीलंका, भारत के मैदानी इलाकों और पहाड़ियों की निचली ढलानों में पाया जाता है। पूंछ समेत उसकी लंबाई 60-120 सेंटीमीटर होती है। दूसरी जातियां जो भारत में पाई जाती हैं, जैसे चिनी वज्रशल्क आदि, 48-93 सेंटीमीटर लंबी होती है। यह जानवर अपने आपको गेंद की तरह गोल बनाकर लुढ़क सकता है।

वज्रशल्क का सिर, पीठ, पूंछ और टांगें सब भूरे रंग की लंबी और धनी खपरियों से ढंकी हुई होती हैं। उसके शरीर का अंदरूनी हिस्सा नरम और रोएंदार होता है। उसकी थूथनी के सिरे पर बगैर दांतों का छोटा-सा मुंह होता है। उसकी लंबी जीभ लगभग एक फुट बाहर निकल सकती है। वज्रशल्क की आंखें छोटी होती हैं और कान खपरियों में छिपे रहते हैं। वह अपने तेज पंजों से जमीन खोदता है। प्रत्येक टांग में पांच उंगलियां होती हैं।

वज्रशल्क बिलों में रहता है। बिल की लंबाई जमीन की स्थिति के अनुसार होती है। मैदानों में 240 सेंटीमीटर, पत्थरीली जमीन में 180 सेंटीमीटर और नरम जमीन में 600 सेंटीमीटर लंबे बिल पाए जाते हैं। ये बिल जमीन के नीचे 60 सेंटीमीटर चौड़ाई के गोलाकार सदन की तरह होते हैं। वज्रशल्क अपने बिल में या चट्टानों के बीच बैठा दिन गुजारता है। वह रात के समय बड़ा उद्यमी दिखाई देता है। वज्रशल्क अपनी सुरक्षा के लिए पेड़ पर भी चढ़ जाता है। पेड़ पर चढ़ते समय वह अपने तेज पंजों और पूंछ की मदद लेता है। वह या तो डाली के इर्द-गेर्द पूंछ को लपेटकर ऊपर चढ़ता है या उससे लटककर। जमीन पर वज्रशल्क धीरे-धीरे चलता है। कभी-कभी चारों ओर अच्छी तरह देखने के लिए वह गिलहरी के समान पिछली टांगों पर खड़ा भी हो जाता है।

वज्रशल्क के प्रजनन के बारे में बहुत कम ज्ञात है, क्योंकि बंदी स्थिति में वह प्रजनन नहीं करता। अलग-अलग प्रदेशों में उसका प्रजनन भी अलग-अलग समय पर होता है। एक बार में एक बच्चा पैदा होता है। कभी-कभार ही दो बच्चे पैदा होते हैं। वज्रशल्क के बच्चे की लंबाई 45 सेंटीमीटर होती है। उसकी खपरियां नरम होती हैं और उसकी खुराक सिर्फ दूध होती है। मादा अपने बच्चे को अपनी पूंछ पर बिठाती है और खतरा महसूस होने पर उसे पूंछ के नीचे ढकेलकर गोल-गुच्छू-बुच्छू हो जाती है जिससे बच्चा उसके पेट के पास पूंछ के नीचे सुरक्षित रहता है। नर-मादा दोनों अपने बच्चें के साथ बिल में रहते हैं।

वज्रशल्क बड़े चाव से दीमक और चीटिंयां खाते हैं। इसीलिए उन्हें चीटीखोर भी कहा जाता है। वज्रशल्क चींटियों और दीमकों की बांबियों को अपने तेज पंजों से खोद डालता है और अपनी लंबी जीभ को बांबी में डालकर टटोलता है। उसकी जीभ चिपचिपी होती है। चींटीं और दीमक जब उससे चिपक जाते हैं, तब वह उन्हें चाट जाता है। जब चींटियां उस पर हमला करती हैं, तब उसके सिर की मजबूत चमड़ी उसकी रक्षा करते हैं। आंखों की रक्षा के लिए उन पर मोटे ढक्कन होते हैं। वज्रशल्क चींटियों के साथ उनके अंडों, डिंभों और कोषों को भी खा जाता है। वे उसके जठर की मोटी मांसपेशियों और उन छोटे कंकड़ों से दली जाती हैं जिन्हें वह समय-समय पर निगलता है।

वज्रशल्क का प्रमुख शत्रु मनुष्य है। उसके मांस के लिए उसे मारा जाता है। उसकी हड्डियों के गहने बनते हैं। वज्रशल्क की हड्डियां दवा के काम भी आती हैं।

पेड़ प्रकृति के वातानुकूलक

पेड़ प्रकृति के वातानुकूलक हैं। एक पेड़ प्रति दिन 400 लिटर पानी हवा में उत्सर्जित करता है, जिससे उतनी ठंडक पैदा होती है जितनी 2500 किलोकेलरी प्रतिघंटा की क्षमता वाले 5 वातानुकूलकों के 20 घंटे निरंतर चलने से पैदा होती है। संवहनी हवाओं के चलते रहने और पत्तों और टहनियों की छाया के कारण भरी दुपहरी में भी पेड़ के नीचे तापमान खुले स्थानों से 10 अंश सेल्सियस कम होता है।

Monday, June 1, 2009

बाल नाटक : पृथ्वी को बुखार आ गया है

1
नीलू की मां उसे लेकर स्कूल से घर लौट रही है।

नीलू – मां, तुझे पता है, आज टीचर ने क्या सिखाया हमें?

मां – हां बता तो।

नीलू – टीचर ने कहा, पृथ्वी को बुखार आ रहा है।

मां – क्या?

नीलू – बुखार, पृथ्वी बीमार हो गई है।

मां – अच्छा?

नीलू – हां मां, पृथ्वी का तापमान बढ़ रहा है।

मां – हुं।

नीलू – टीचर ने कहा, इससे हम सब भी बीमार हो जाएंगे।

मां – ऐसा क्या?

नीलू – टीचर बोलीं, बारिश नहीं होगी, गर्मी बढ़ेगी, सब जगह रेगिस्तान हो जाएगा। सब जीव-जंतु और हम, मर जाएंगे। क्या ऐसा होगा, मां?

मां – चल हाथ-मुंह धोकर खाने बैठ। इसकी बात बाद में करेंगे। देख तो घर में कौन आए हैं?

नीलू – कौन मां?

मां – गांव से तेरे दादाजी। अभी उन्हें तंग मत कर, खाने के बाद मिल लेना।


2
नीलू, उसके माता-पिता, और दादाजी बात कर रहे हैं।

पिता – प्रणाम बाबूजी!

दादा – जीते रहो बेटा!

पिता – ऐसे अचानक चले आए। चिट्ठी भेज दी होती, तो लेने आ जाता।

दादा – नहीं बेटा, तुम इतने व्यस्त रहते हो। अपना क्या है, खाली बैठे हैं। गांव में हाल बुरा है बेटा।

पिता – क्यों क्या हुआ बाबूजी।

दादा – मालूम नहीं पड़ता बेटा। सब कुछ बदल रहा है। किसी का कुछ ठिकाना नहीं रहा। मार्च-अप्रैल में ही बारिश हो जाती है। और इतनी तेज बारिश कि कटाई के लिए तैयार फसल खराब हो जाती है। और जून-जुलाई में जब सारा खेत जोतकर तैयार बैठे होते हैं कि बारिश आए और बुआई शुरू करें, तब बारिश कहां है? जानते हो पिछले साल कब बारिश आई? ठेठ सितंबर में। ऐसा कभी होते देखा है? मई-जून की बारिश मार्च और सितंबर में हो रही है। कुछ समझ में नहीं आता कि क्या हो रहा है। ऐसे में कोई खेती करे तो कैसे? मौसम का अनुमान ही नहीं हो पाता।

पिता – हुं। मौसम सचमुच बदल रहा है। अखबार, टीवी में भी इसकी खूब चर्चा हो रही है।

नीलू – टीचर भी यही कहती थी। मौसम बदल रहा है। पृथ्वी बीमार हो रही है। पापा, पृथ्वी क्यों बीमार हो रही है?

दादा – कलियुग आ गया है। और क्या!

3
नीलू, परिवार समेत टीवी देखने बैठी है।

टीवी से - "ह" चैनल में आपका स्वागत है। मैं हूं स्वाती पंचाल। अब सुनिए “ह” चैनल की तेज-तर्रार खबरें।

चीन में असमय की बारिश से भारी बाढ़ आ गई है। पानी बीजिंग शहर में घुसने से लाखों लोगों के लिए संकट पैदा हो गया है। राहत कार्य जोरों पर है।

दादाजी – कलियुग, घोर कलियुग। यहां बूंद-बूंद के लिए तरस रहे हैं, वहां प्रलय मचा हुआ है।

टीवी से स्वाती – वैज्ञानिक इस असमय की बारिश से परेशान हैं। उनका कहना है कि यह पृथ्वी की जलवायु के बदलने का एक और प्रमाण है।

और देश के अधिक निकट, समाचार है कि गंगोत्री का हिमनद पिघलने लगा है। बर्फ की बड़ी-बड़ी सिल्लियां नीचे की ओर बह रही हैं, जिससे अलमोड़ा, देहरादून, ऋषीकेश आदि निचले शहरों को खतरा पैदा हो गया है। गंगा का जल-स्तर बढ़ने के भी संकेत हैं। इसे भी वैज्ञानिक पृथ्वी के गरमाने से जोड़कर देख रहे हैं।

मेरे साथ इस समय स्टूडियो में मौसम विभाग की अध्यक्ष डा प्रेमलता परमार हैं। उनसे समझने की कोशिश करते हैं कि यह सब क्या हो रहा है। प्रेमलता जी, स्टूडियो में आने के लिए धन्यवाद। अच्छा बताइए, यह सब हो क्या रहा है। एक ओर बाढ़, एक ओर सूखा, कहीं बर्फ पिघल रही है, कहीं बेमौसम की बारिश...

प्रेमलता – हां, इसका तो डर था ही। वैज्ञानिक पहले से ही चेतावनी दे रहे हैं, कि मानव-क्रियाकलापों से पृथ्वी गरमाने लगी है। ये सब मौसमी परिवर्तन इसी के परिणाम हैं।

स्वाती – प्रेमलता जी, किन मानव क्रियाकलापों के ये परिणाम हैं?

प्रेमलता – पेड़ों का अंधाधुंध काटा जाना, धुंआं उगलते कारखानों की संख्या में बेतहाशा वृद्धि, शहरों का फैलाव, वाहनों की रेल-पेल... ये ही सब इसके कारण हैं। इन सबसे वायुमंडल में कार्बन डाइआक्साइड की मात्रा बढ़ रही है, जो सूर्य से आनेवाली गरमी को पृथ्वी पर ही रोक लेती है। यह कार्बन डाइआक्साइड पृथ्वी को एक चादर की तरह लपेट लेती है और उसे गरम करती जाती है। इससे ध्रुवों और पहाड़ों की बर्फ पिघलने लगी है, समुद्र का स्तर ऊपर उठ रहा है, तटीय इलाके डूब रहे हैं, वर्षा की परिपाटी बदल गई है। जहां पहले बारिश होती थी, वहां नहीं हो रही है, जहां नहीं होती थी, वहां हो रही है। हमारे देश में भी यही सब देखा जा रहा है। पिछले साल कृषि पैदावार इसी कारण चौपट हो गई थी। असमय की बरसात से पकी फसल नष्ट हो गई। और अगली बुआई के लिए बारिश ही नहीं आई...

दादाजी – बिलकुल ठीक... घोर कलियुग... शिव, शिव...

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नीलू स्कूल में बैठी है।

नीलू – मैंम आपने पिछली कक्षा में कहा था कि पृथ्वी को बुखार हो गया है और इससे हम सब भी बीमार हो जाएंगे। पृथ्वी को कैसे ठीक किया जा सकता है, कौन-सी दवा पीने से पृथ्वी ठीक हो सकती है, ताकि हम भी बीमार होने से बच सकें?

टीचर – नीलू, तुमने बहुत अच्छा सवाल पूछा है। पर पृथ्वी का बुखार उतारना आसान नहीं है। उसका बुखार कई सालों की हमारी करतूतों का परिणाम है। पर हम अपनी आदतें बदल सकते हैं और ऐसे काम कर सकते हैं, जिनसे पृथ्वी को आराम मिले।

नीलू – वे कौन से काम हैं?

टीचर – तुम में से हर बच्चा सभी वस्तुओं का किफायती उपयोग करे। बिजली का, पानी का, भोजन का, कागज का, कपड़े का। इनमें से किसी का भी अपव्यय मत करो। ये सब पृथ्वी से चीजें निकालकर बनाई जाती हैं। यों समझ लो कि पृथ्वी की छाती फाड़कर। यदि हम कम वस्तुओं से काम चलाएं, तो पृथ्वी को कम चोट पहुंचेगी। अच्छा बताओ, चोट लगने पर हम क्या करते हैं?

बच्चे – चोट पर मरहम लगाते हैं।

टीचर – शाबाश! अच्छा बता सकते हो, पृथ्वी के लिए सबसे अच्छा मरहम क्या है?

नहीं मालूम? ठीक है, मैं ही बता देती हूं। वह है पेड़-पौधे। यदि पृथ्वी का शरीर पेड़-पौधों से ढका रहे, तो उसे चोट नहीं लगती, और उसके घाव भर जाते हैं। तुम सबको अपने घर के पास कम से कम एक पेड़ तो लगाना ही चाहिए। और केवल लगाना ही नहीं है, उसकी देखभाल तब तक करनी चाहिए, जब तक वह बड़ा न हो जाए।

5
नीलू और उसके साथी, पेड़ लगा रहे हैं।

नीलू – इसे कहां लगाएं?

शालिनी – क्या यह स्थान ठीक रहेगा? यह रास्ते से कुछ हटकर है।

विपिन – हां यह अच्छी जगह है। लाओ यहां मैं गड्ढा खोदता हूं।

जावेद – नीलू, लाओ तो पौधा... संभलकर।

शबनम – यह लो मैं पानी छिड़कती हूं। कैसे कुम्हला सा गया है बेचारा।

ऐंथनी – आओ इसके चारों ओर इन ईंटों को सजा दें, ताकि हमारा पौधा सुरक्षित रहे।

नीलू – अब रोज स्कूल से आकर इसे हम पानी देंगे। याद रहे, यह पृथ्वी का मरहम है। यह पेड़ पृथ्वी का बुखार उतारेगा, और हम सबको बीमारी से बचाएगा।

पैगंबर सुलैमान और हुदहुद पक्षी

हुदहुद पक्षी के बारे में मेरे पिछले पोस्ट पर श्री अर्विंद मिश्रा जी ने टिप्पणी की थी कि यह पक्षी इस्लाम धर्म में पवित्र माना जाता है। यह मेरे लिए नई जानकारी थी, और इसके बारे में अधिक जानने के लिए मैंने थोड़ी गूगलिंग की। इससे मुझे हुदहुद पक्षी के बारे में एक रोचक कथा पढ़ने को मिली, जिसे मैं यहां दे रहा हूं। आपको भी अच्छा लगेगा, उसे पढ़ना।

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पैगंबर सुलैमान के पास बहुद बड़ी सेना थी जिसमें मनुष्य, जिन्न और पशु-पक्षी शामिल थे। एक दिन वे अपनी सेना का निरीक्षण कर रहे थे। उन्होंने अपने पक्षी सैनिकों की ओर देखकर पूछा, “हुदहुद कहीं नहीं दिख रहा, वह कहां गया।"

सेना को जब भी पानी की आवश्यकता होती थी, तब यह काम हुदहुद को ही दिया जाता था। वह रेगिस्तान में कहां पानी है, इसका पता लगाकर आता था। उस दिन हुदहुद सुलैमान से पूछे बगैर कहीं चला गया था। इसलिए सुलैमान ने मन बना लिया कि यदि वह अपनी गैरहाजिरी के लिए अच्छा कारण न बता सका, तो मैं उसे कड़ी सजा दूंगा।

जब हुदहुद लौट आया, तो उसने सुलैमान को बताया कि वह कहां गया था और उसने क्या देखा, “...मैं शीबा के देश से आ रहा हूं, और मैं आपको वहां की अत्यंत रोचक वृत्तांत सुनाऊंगा। वहां मैंने देखा कि एक औरत लोगों पर राज कर रही है। उसे बहुत से वरदान प्राप्त हैं, उसका सिंहासन बहुत ही भव्य है। मैंने देखा कि वह तथा उसकी प्रजा अल्लाह को नहीं बल्की सूर्य की पूजा करते हैं।"

जब सुलैमान ने रानी बिलकिस और उसके राज्य यमन के बारे में यह बात सुनी, तो उन्हें बहुत आश्चर्य हुआ। उन्हें यह जानने का कौतूहल हुआ कि हुदहुद ने जो कहा है वह सही है या उसने अपना बचाव करने के लिए झूठ बोला है। उन्होंने उसी वक्त रानी बिलकिस को एक पत्र लिखा, जिसमें उनसे आग्रह किया कि वे अल्लाह को अपने ईश्वर के रूप में कबूल करें और सूर्य की पूजा करना बंद करें। फिर उन्होंने हुदहुद को वह पत्र थमाते हुए कहा कि जाओ और रानी का उत्तर लेकर आओ।

जब रानी बिलकिस ने वह पत्र पढ़ा तो उन्हें समझ में नहीं आया कि क्या करें। उन्होंने अपने मंत्रियों और सेनापतियों की सलाह ली। सेनिपतियों ने कहा कि वे जो भी निर्णय लेंगी उसका वे अनुसरण करेंगे। रानी बिलकिस जानना चाहती थीं कि सुलैमान कोई साधारण राजा है जो उसकी दौलत हथियाना चाहता है या उनमें कोई विशिष्ट बात है। इसलिए उन्होंने सुलैमान की परीक्षा लेने का निर्णय लिया।

रानी बिलकिस ने बहुत सारा सोना, चांदी, रत्न, मोती आदि कीमती सामान तोहफे के रूप में सुलैमान को भिजवाया।

जब सुलैमान ने इन्हें देखा, तो बोले, "अरे, क्या तुम दौलत देकर मेरी मदद करोगे? अल्लाह ने मुझे जो सब दिया है, वह इस तुच्छ तोहफे से कहीं बेहतर है। ये तोहफे तुम्हारी आंखों को बेशकीमती लग सकते हैं, मुझे नहीं।”

और उन्होंने उन सब तोहफों को वापिस भेज दिया।

रानी बिलकिस के भेजे हुए लोग तोहफे के साथ शीबा लौट आए। उन्होंने रानी को पैगंबर सुलैमान के भव्य देश में उन्होंने जो कुछ देखा था, उसका वर्णन सुनाया।

तब रानी बिलकिस को मालूम हुआ कि पैंगंबर सुलैमान सचमुच एक महान और धर्मानुरागी व्यक्ति हैं, और अल्लाह ने उन्हें विशेष अधिकार और शक्तियां प्रदान की हैं। रानी ने यह भी निश्चय किया कि वह स्वयं जाकर सुलैमन के देश को देख आएगी।

जब सुलैमान को उसके इरादे के बारे में पता चला, तो उन्होंने तय किया कि मैं रानी को अल्लाह से मुझे मिली हुई अद्भुत शक्तियां दिखाऊंगा, ताकि उसे यकीन हो जाए कि एक ही ईश्वर होता है।

उन्होंने कहा, “हे महान योद्धाओ, तुममें से कौन जाकर रानी के आने से पहले मुझे शीबा का भव्य सिंहासन लाकर देगा?”

एक जिन्न इसके लिए राजी हुआ, पर सुलैमान उसे आदेश दे, इसके पहले ही उनके एक मंत्री, असिफ बेन बरखिया, ने कहा, “मैं यह कार्यभार स्वीकारता हूं, और पलक झपकते ही उस सिंहासन को यहां लाकर रख दूंगा।”

और सचमुच ही, पैगंबर सुलैमान अपनी आंखें झपकते, इसके पहले ही शीबा का सिंहासन उनके सामने था, हालांकि शीबा का देश बहुत दूर था, - रानी बिलकिस यमन की शासक थीं, और पैगंबर सुलैमान फिलिस्तीन के।

जब सुलैमान ने यह करिश्मा देखा, तो उन्होंने अल्लाह को खूब धन्यवाद दिया।

उसके बाद उन्होंने आदेश दिया कि रानी बिलकिस के स्वागत के लिए एक नया महल बनाया जाए, जिसकी फर्श कांच की हो। यह फर्श पानी के एक तालाब के ऊपर बने, ताकि जब कोई व्यक्ति उस पर चले, तो ऐसा लगे कि वह पानी पर चल रहा है।

जब रानी बिलकिस आईं, तो उन्हें इसी महल में ले जाया गया। जब उसके विशाल द्वारों से होकर वे अंदर गईं, उन्हें सामने एक बड़ा तालाब दिखा। उन्होंने अपने लिबास को थोड़ा ऊपर उठा लिया ताकि उस तालाब पर से जाते हुए वह न भीगे, और डरते-डरते उन्होंने कांच की फर्श की ओर पैर बढ़ाया।

पैगंबर सुलैमान यह सब देख रहे थे। उन्होंने मुस्कुराकर कहा, इसकी कोई आवश्यकता नहीं है, आप बिलकुल भीगेंगी नहीं। तब रानी बिल्किस ने महल में कदम रखा।

रानी बिल्किस एक बुद्धिमान महिला थीं। वे तुरंत समझ गईं कि पैगंबर सुलैमान उन्हें समझाने की कोशिश कर रहे हैं कि सूर्य की उपासना करके वह गलती कर रही हैं, क्योंकि सूर्य से भी कहीं शक्तिशाली अल्लाह की उपासना करना ज्यादा उचित है।

उन्होंने तुरंत अपनी गलती कबूल कर ली और सुलैमान को देखते हुए कहा, “मैं अल्लाह के पैगंबर सुलैमान के साथ दुनिया के बादशाह अल्लाह के सामने आत्मसमर्पण करती हूं।”

30 साल लगते हैं एक डाली बनने में


सुगुआरो कैक्टस (कार्नेजिया जाइगैंटिया) दुनिया का सबसे धीमी गति से बढ़नेवाला पौधा है। उसकी एक डाली पूरे 30 साल में तैयार होती है।

सगुआरो उत्तरी अमरीका (अरिजोना) में पाया जाता है। उसकी बढ़त धीमी होते हुए भी वह 18 मीटर की ऊंचाई प्राप्त कर सकता है। इतना बड़ा होते हुए भी, इसकी अधिकांश जड़ें जमीन में कुछ ही सेंटीमीटर की गहराई में फैली होती हैं। केवल एक मुख्य जड़ जमीन में लगभग दो फुट की गहराई तक उतरता है। इस कारण सगुआरो तूफानों में आसानी से उखड़ जाता है। स्थानीय निवासी सूखे सगुआरो तने से घरों की छतें, फर्नीचर, बाड़ आदि बनाते हैं।

वह एक दीर्घजीवी पौधा है, जो 200 साल तक जीवित रह सकता है।

इसके फूल रात को खिलते हैं। यह रेगिस्तानी पौधा अनेक पशु-पक्षियों को सहारा देता है। इनमें शामिल है गिला कठफोड़वा, बैंगनी मार्टिन, घरेलू फिंच, गिल्डेड फ्लिकर (एक प्रकार की चिड़िया), एल्फ आउल (बौना उल्लू), इत्यादि। ये इस पौधे के लंबे तने में छेद करके उनमें रहते हैं।

हमारे पक्षी मित्र : हुदहुद


हुदहुद हमारा खूब परिचित पक्षी है। उसे बहुत लोग कठफोड़ा समझ बैठते हैं। पर ये दोनों अलग-अलग वर्ग के पक्षी हैं।

हुदहुद मैना जितना होता है। उसका शरीर 30 सेंटीमीटर लंबा होता है। उसके उजले बादामी रंग के बदन पर जेबरे के समान काली-सफेद पट्टियां होती हैं। गले और छाती का रंग हल्का होता है। पेट सफेदी लिए होता है। चोंच लगभग 5 सेंटीमीटर लंबी, घुमावदार, नुकीली और काली होती है। माथे पर बादामी रंग की कलगी होती है जिसका ऊपरी सिरा काला होता है। कलगी खोली और बंद की जा सकती है। बंद रहने पर ऐसा लगता है मानो पक्षी के सिर पर पीछे की ओर दूसरी घुमावदार चोंच हो। फैलने पर कलगी सुंदर गोल पंखा बन जाती है। उड़कर आकर बैठने पर हर बार थोड़ी देर के लिए हुदहुद अपनी कलगी खोलता है। उत्तेजित होने पर या घबराहट में भी वह कलगी खोलता है। उसके पैर छोटे और राख के रंग के होते हैं। वे चलने-दौड़ने के अनुकूल होते हैं। हुदहुद जमीन पर तेज-तेज कुछ दूर दौड़ता है, फिर कुछ देर रुकता है और उसके बाद फिर तेजी से आगे बढ़ जाता है। नर-मादा एक जैसे होते हैं।

हुदहुद विश्व के सभी गरम इलाकों में पाया जाता है। भारत में चौमासे के समाप्त होते ही वह हिमालय छोड़कर भारत के सभी निचाई वाले इलाकों में फैल जाता है। उसे खुले और कम झाड़ियों वाले खेत, घास के मैदान, धूल भरे मार्ग आदि पसंद हैं। धूल में लोटने का भी उसे बड़ा शौक है। हुदहुद समूहचारी पक्षी नहीं है, साधारणतः अकेले ही दिखता है। वह ज्यादा शोर नहीं करता है। जब बोलता है, तब "हु..द...हुद...हू...द" ऐसी उसकी पुकार होती है। इसी कारण उसका नाम हुदहुद पड़ गया है। उसकी आवाज धीमी और कोमल होती है। बोलते समय वह सिर को इस और उस ओर हिलाता है, जिससे यह पता नहीं लग पाता कि आवाज कहां से आ रही है।

हुदहुद ख़ुराक जमीन पर से खोजता है। जमीन के अंदर छिपे कीड़े-मकोड़े, कनखजूरे, छिपकली, दीमक, इल्ली आदि को वह खाता है। उनके लिए वह अपनी लंबी और नुकीली चोंच जमीन पर मारता है। जमीन पर चल रहे कीड़ों को भी वह पकड़ता है। इस तरह वह खेती के लिए उपयोगी है। उसकी उड़ान धीमी और ऊंची-नीची होती हुई होती है। जमीन से अधिक ऊंचाई पर वह नहीं उड़ता। हुदहुद शर्मीला पक्षी नहीं है, मनुष्य को काफी पास तक आने देता है।

उसका घोंसला वृक्ष के किसी कोठर में होता है। मादा उसमें 5-8 अंडे देती है और उन्हें स्वयं सेती है। अंडों को सेती मादा को नर खाना लाकर खिलाता है। चूजों के आने पर नर-मादा दोनों मिलकर उनके लिए भोजन का बंदोबस्त करते हैं।
 

हिन्दी ब्लॉग टिप्सः तीन कॉलम वाली टेम्पलेट