
कुदरतनामा के पाठक अजय कुमार झा ने पूछा है, क्या गैंडे को गुदगुदी होती है?
सवाल दिलचस्प है। हम उसे थोड़ा सा बदल देते हैं, ताकि उत्तर दिया जा सके। गुदगुदी की जगह खुजली मान लेते हैं। कल्पना कीजिए एक गैंडे की जिसकी पीठ में जोरों की खुजली हो रही है। वह बेचारा क्या करेगा? न तो उसके लंबे नाखूनोंवाले हाथ-पैर हैं, जिनसे वह अपनी पीठ खुजा सके। उसके पैरों में उंगलियां तक नहीं हैं, बस खुर हैं। और चमड़ी भी इतनी मोटी कि खुजली मिटाने के लिए कोई साधारण नाखून पर्याप्त नहीं होंगे, अच्छा खासा इलेक्ट्रिक ड्रिल ही चाहिए होगा असर करने के लिए। और चमड़ी भी सिलवटदार, उसके मोडों में गंदगी खूब जमा होकर खुजली मचाती होगी। पर गैंडा करे भी तो क्या? हां उसकी नोंकदार सींग जरूर एक उपयोगी औजार है जिससे खुजली मिटाई जा सकती है, पर बेचारे की गर्दन इतनी छोटी है के वह सिर घुमा ही नहीं सकता। तो यह उपाय भी बेकार गया।
तो क्या करता है गैंडा जब उसकी पीठ पर होती है खुजली! आप निश्चिंत रहें, कुदरत ने अपने सभी पुत्रों के आराम की व्यवस्था की है।
खुजली मिठाने के लिए गैंडे के पास दो-एक कारगर तरीके हैं, जिसे अन्य जानवर भी आजमाते हैं। इनमें से पहला है, कीचड़-धूल में लोटना। गैंडा कीचड़-धूल में खूब लोटता है। उल्टा लेटकर अपनी पीठ को खूब रगड़ता है कीचड़ में। इससे उसे खुजली से तो राहत मिल ही जाती है, उसके पूरे शरीर पर कीचड़-धूल की एक परत भी जम जाती है। इससे खुजली लानेवाले जीव-जंतु, जैसे पिस्सू, मर जाते हैं। कुछ प्रकार की मिट्टियों में इन कीड़े-मकोड़ों को मारने की क्षमता भी पाई जाती है। आपने मिट्टी चिकित्सा के बारे में सुना होगा, गांधी जी भी इसके शौकीन थे। शायद यह चिकित्सा पद्धति गैंडे जैसे जानवरों की देखादेखी विकसित की गई है। हमने अपने जानवर मित्रों से बहुत कुछ सीखा है, मसलन, डालफिनों से पंडुब्बी बनाना, पक्षियों से उड़ना, और गैंडों से मिट्टी चिकित्सा।
खुजली मिटाने का एक दूसरा तरीका जो गैंडे, तथा अन्य जानवर, अपनाते हैं, वह है ओक्सपेकर नामक पक्षी की सहायता लेना। गैंडों और इस पक्षी के बीच आश्रित-आश्रयदाता का संबंध पाया जाता है। गैंडे जैसा खौफनाक जानवर जो शेर को भी पास फटकने नहीं देता, इस मासूम चिड़िया को अपने शरीर पर जो चाहे करने की पूरी छूट देता है। आप इस पक्षी को उसके कान से झूलते हुए या पीठ पर शान से सवारी करते हुए आम तौर पर देख सकते हैं। यह चिड़िया गैंडे के शरीर में खुजली पैदा कर रहे पिस्सू, मक्खी, कीड़े आदि को पकड़कर खाती है। इससे गैंडे को खुजली से निजात मिल जाती है, और पक्षी की पेट-पूजा भी हो जाती है।
इन दोनों के बीच के संबंध के कुछ अन्य फायदे भी हैं। गैंडे की दृष्टि कमजोर होती है। वह अपनी आंखों के आगे कुछ फुट की दूरी तक ही देख पाता है। जीवित रहने के लिए वह श्रवण और घ्राणेंद्रियों पर अधिक निर्भर करता है। लेकिन ओक्सपेकर पक्षियों की नजरें तेज होती हैं। जब वे किसी परभक्षी जानवर को देखते हैं, जैसे बाघ, तेंदुआ आदि, तो चेतावनी पुकार निकालते हुए गैंडे की पीठ से उड़ जाते हैं। इससे गैंडे को पता चल जाता है कि आसपास कहीं खतरा विद्यामान है और वह सावधान हो जाता है।
और कोई सवाल? क्या कोई जानना चाहेगा, हाथी को हंसी आती है?
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चित्र के बारे में - यह अफ्रीकी गैंडा है। आप देख सकते हैं कि इसमें दो सींग हैं, जिनमें से एक पर ओक्सपेकर चिड़िया बैठी है। एक दूसरी चिड़िया जरा पीछे गैंडे की पीठ पर बैठी है। भारतीय गैंडे में केवल एक सींग होता है। वह अफ्रीकी गैंडे से थोड़ा बड़ा होता है।